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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 8th Feb 2025

    ज़िंदगी ज़ुल्फ़ तिरी !

    न तो दम लेती है तू और न हवा थमती है,ज़िंदगी ज़ुल्फ़ तिरी कोई सँवारे कैसे| जावेद अख़्तर

  • 8th Feb 2025

    अरमान सभी ख़ाक!

    दिल बुझा जितने थे अरमान सभी ख़ाक हुए,राख में फिर ये चमकते हैं शरारे कैसे| जावेद अख़्तर

  • 8th Feb 2025

    पुकारे तो पुकारे कैसे!

    हर तरफ़ शोर उसी नाम का है दुनिया में,कोई उस को जो पुकारे तो पुकारे कैसे| जावेद अख़्तर

  • 8th Feb 2025

    क्या जाने सितारे कैसे!

    हाथ को हाथ नहीं सूझे वो तारीकी थी,आ गए हाथ में क्या जाने सितारे कैसे| जावेद अख़्तर

  • 8th Feb 2025

    इन सराबों पे कोई!

    हम ने ढूँडें भी तो ढूँडें हैं सहारे कैसे,इन सराबों पे कोई उम्र गुज़ारे कैसे| जावेद अख़्तर

  • 8th Feb 2025

    लहू में जज़्ब हो सका!

    लहू में जज़्ब हो सका न इल्म तो ये हाल है,कोई सवाल ज़ेहन को जो दे जला नहीं रहा| जावेद अख़्तर

  • 8th Feb 2025

    अब सिला नहीं रहा!

    बदल गई है ज़िंदगी बदल गए हैं लोग भी,ख़ुलूस का जो था कभी वो अब सिला नहीं रहा| जावेद अख़्तर

  • 8th Feb 2025

    जब यह दीप थके!

    आज मैं छायावाद युग की एक प्रमुख कवियित्री स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। महादेवी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी का यह गीत – जब यह दीप थके तब आना। यह चंचल सपने भोले है,दृग-जल पर पाले…

  • 7th Feb 2025

    पलक पे अब कोई

    ख़ज़ाना तुम न पाए तो ग़रीब जैसे हो गए, पलक पे अब कोई भी मोती झिलमिला नहीं रहा| जावेद अख़्तर

  • 7th Feb 2025

    फूल शाख़ पर तो है!

    न हिज्र है न वस्ल है अब इस को कोई क्या कहे,कि फूल शाख़ पर तो है मगर खिला नहीं रहा| जावेद अख़्तर

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