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ज़िंदगी ज़ुल्फ़ तिरी !
न तो दम लेती है तू और न हवा थमती है,ज़िंदगी ज़ुल्फ़ तिरी कोई सँवारे कैसे| जावेद अख़्तर
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अरमान सभी ख़ाक!
दिल बुझा जितने थे अरमान सभी ख़ाक हुए,राख में फिर ये चमकते हैं शरारे कैसे| जावेद अख़्तर
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पुकारे तो पुकारे कैसे!
हर तरफ़ शोर उसी नाम का है दुनिया में,कोई उस को जो पुकारे तो पुकारे कैसे| जावेद अख़्तर
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क्या जाने सितारे कैसे!
हाथ को हाथ नहीं सूझे वो तारीकी थी,आ गए हाथ में क्या जाने सितारे कैसे| जावेद अख़्तर
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इन सराबों पे कोई!
हम ने ढूँडें भी तो ढूँडें हैं सहारे कैसे,इन सराबों पे कोई उम्र गुज़ारे कैसे| जावेद अख़्तर
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लहू में जज़्ब हो सका!
लहू में जज़्ब हो सका न इल्म तो ये हाल है,कोई सवाल ज़ेहन को जो दे जला नहीं रहा| जावेद अख़्तर
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अब सिला नहीं रहा!
बदल गई है ज़िंदगी बदल गए हैं लोग भी,ख़ुलूस का जो था कभी वो अब सिला नहीं रहा| जावेद अख़्तर
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जब यह दीप थके!
आज मैं छायावाद युग की एक प्रमुख कवियित्री स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। महादेवी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी का यह गीत – जब यह दीप थके तब आना। यह चंचल सपने भोले है,दृग-जल पर पाले…
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पलक पे अब कोई
ख़ज़ाना तुम न पाए तो ग़रीब जैसे हो गए, पलक पे अब कोई भी मोती झिलमिला नहीं रहा| जावेद अख़्तर
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फूल शाख़ पर तो है!
न हिज्र है न वस्ल है अब इस को कोई क्या कहे,कि फूल शाख़ पर तो है मगर खिला नहीं रहा| जावेद अख़्तर