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कोई झंकार है नग़्मा!
कोई झंकार है नग़्मा है सदा है क्या है,तू किरन है के कली है के सबा है क्या है| नक़्श लायलपुरी
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ज़ुल्म करना है तो!
नाले ‘बेख़ुद’ के क़यामत हैं तुझे याद रहे,ज़ुल्म करना है तो पत्थर का जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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राह नज़दीक की!
दिल में भी मिलता है वो काबा भी उस का है मक़ाम,राह नज़दीक की ऐ अज़्म-ए-सफ़र पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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ये कमाँ क़ातिल की!
मुझ से कहती है कड़क कर ये कमाँ क़ातिल की,तीर बन जाए निशाना वो जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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अभी घर पैदा कर!
मुझ से घर आने के वादे पर बिगड़ कर बोले,कह दिया ग़ैर के दिल में अभी घर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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रंज सहने को हमारा!
शिकवा-ए-दर्द-ए-जुदाई पे वो फ़रमाते हैं,रंज सहने को हमारा सा जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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ख़ाक में पर पैदा कर!
मिट के भी दूरी-ए-गुलशन नहीं भाती या रब,अपनी क़ुदरत से मिरी ख़ाक में पर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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पर आँखें नहीं भरीं!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। सुमन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी का यह गीत – कितनी बार तुम्हें देखापर आँखें नहीं भरीं। सीमित उर में चिर-असीमसौंदर्य समा न…
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आग पानी में भी!
मुझ को रोता हुआ देखें तो झुलस जाएँ रक़ीब,आग पानी में भी ऐ सोज़-ए-जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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मेरी नज़र पैदा कर!
आईना देखना इस हुस्न पे आसान नहीं,पेश-तर आँख मिरी मेरी नज़र पैदा कर| बेख़ुद देहलवी