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आज फिर रंग पे है!
आज फिर रंग पे है शाम ख़ुदा ख़ैर करे,फिर मिरे हाथ में है जाम ख़ुदा ख़ैर करे। बाल स्वरुप राही
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तीरगी की क़ैद में हूँ!
गुनाह ये है कि क्यूँ अपना नाम रखा ‘नूर’,वो दिन और आज का दिन तीरगी की क़ैद में हूँ| कृष्ण बिहारी नूर
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सुंदर कांड से छोटा सा अंश
मुकेश जी द्वारा जो सुंदर कांड का पाठ किया गया था, उसमें से ही एक छोटा सा अंश अपनी स्मृति के अनुसार प्रस्तुत कर रहा हूँ- आशा है आपको पसंद आएगा,एक और अंश बाद में प्रस्तुत करूंगा।धन्यवाद।
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किसी की क़ैद से!
ग़रज़ नसीब में लिक्खी रही असीरी ही,किसी की क़ैद से छूटा किसी की क़ैद में हूँ| कृष्ण बिहारी नूर
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एकलव्य हम!
आज फिर से मेरा एक पुराना गीत प्रस्तुत है, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- मौसम के फूहड़ आचरणों पर व्यंग्य बाण,साधे पूरे दम से, खुद को करके कमान,छूछी प्रतिमाओं को दक्षिणा चढ़ानी थी,यह हमसे कब हुआ। कूटनीति के हमने, पहने ही नहीं वस्त्र,बालक सी निष्ठा से लिख दिए विरोध-पत्र,बैरी अंधियारे से कॉपी जंचवानी थी,यह हमसे…
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जहाँ मैं क़ैद से छूटूँ!
जहाँ मैं क़ैद से छूटूँ वहीं पे मिल जाना,अभी न मिलना अभी ज़िंदगी की क़ैद में हूँ| कृष्ण बिहारी नूर
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बेचारगी की क़ैद में हूँ!
न जाने कितनी नक़ाबें उलटता जाता हूँ,जन्म जन्म से मैं बेचारगी की क़ैद में हूँ| कृष्ण बिहारी नूर
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गिरफ़्त मौत की है!
ये किस ख़ता की सज़ा में हैं दोहरी ज़ंजीरें,गिरफ़्त मौत की है ज़िंदगी की क़ैद में हूँ| कृष्ण बिहारी नूर
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किसी के रुख़ से!
किसी के रुख़ से जो पर्दा उठा दिया मैं ने,सज़ा ये पाई कि दीवानगी की क़ैद में हूँ| कृष्ण बिहारी नूर
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युगों युगों से यूँही!
न कोई सम्त न जादा न मंज़िल-ए-मक़्सूद,युगों युगों से यूँही बे-रुख़ी की क़ैद में हूँ| कृष्ण बिहारी नूर