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किसे ख़बर है कि!
किसे ख़बर है कि कासा-ब-दस्त फिरते हैं,बहुत से लोग सरों पर हुमा के होते हुए| अहमद फ़राज़
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दिलरुबा के होते हुए!
‘फ़राज़’ ऐसे भी लम्हे कभी कभी आए,कि दिल-गिरफ़्ता रहे दिलरुबा के होते हुए| अहमद फ़राज़
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न चाहने पे भी!
न चाहने पे भी तुझ को ख़ुदा से माँग लिया,ये हाल है दिल-ए-बे-मुद्दआ के होते हुए| अहमद फ़राज़
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हवा के होते हुए!
वो हीला-गर हैं जो मजबूरियाँ शुमार करें,चराग़ हम ने जलाए हवा के होते हुए| अहमद फ़राज़
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है आश्ना की तलब!
ये क़ुर्बतों* में अजब फ़ासले पड़े कि मुझे,है आश्ना की तलब आश्ना के होते हुए| *Relations अहमद फ़राज़
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गिला फ़ुज़ूल था!
गिला फ़ुज़ूल था अहद-ए-वफ़ा के होते हुए,सो चुप रहा सितम-ए-ना-रवा के होते हुए| अहमद फ़राज़
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सहर क़रीब है!
सबा ने फिर दर-ए-ज़िंदाँ पे आ के दी दस्तक,सहर क़रीब है दिल से कहो न घबराए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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लिपटी परछाइयां!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय कुंवर नारायण जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। कुंवर नारायण जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुंवर नारायण जी की यह कविता – उन परछाइयों को,जो अभी अभी चाँद की रसवंत गागर से गिरचाँदनी में सनीखिड़की पर…
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न दिन को अब्र आए!
ये ज़िद है याद हरीफ़ान-ए-बादा-पैमा की, कि शब को चाँद न निकले न दिन को अब्र आए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़