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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 12th May 2025

    दश्त मेरा घर तो नहीं!

    मिरे दिमाग़ पे आसेब का असर तो नहीं,गुमाँ गुज़रता है ये दश्त मेरा घर तो नहीं। क़मर अब्बास क़मर

  • 12th May 2025

    कंगन दिलाने के लिए!

    मैं ‘ज़फ़र’ ता-ज़िंदगी बिकता रहा परदेस में,अपनी घर-वाली को इक कंगन दिलाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी

  • 12th May 2025

    संजीदा बनाने के लिए!

    देर तक हँसता रहा उन पर हमारा बचपना,तजरबे आए थे संजीदा बनाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी

  • 12th May 2025

    छत टपकती थी!

    छत टपकती थी अगरचे फिर भी आ जाती थी नींद,मैं नए घर में बहुत रोया पुराने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी

  • 12th May 2025

    मैंने अपने गानों को जन्म दिया!  

    आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ व्यंग्यकार एवं कवि स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की एक कविता  शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले ही शेयर की है।   लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की यह कविता  – मैंने अपने गानों को जन्म दियाएकदम चुपचाप-अकेले,पर फिर भी एक दिनउन सबके कण्ठ खुले,और…

  • 11th May 2025

    आसमाँ ऐसा भी क्या!

    आसमाँ ऐसा भी क्या ख़तरा था दिल की आग से,इतनी बारिश एक शोले को बुझाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी

  • 11th May 2025

    वक़्त होंटों से मिरे!

    वक़्त होंटों से मिरे वो भी खुरच कर ले गया,इक तबस्सुम जो था दुनिया को दिखाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी

  • 11th May 2025

    बच्चा निराले मेरे खेल!

    रेत मेरी उम्र मैं बच्चा निराले मेरे खेल,मैं ने दीवारें उठाई हैं गिराने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी

  • 11th May 2025

    बन गई है मसअला!

    मेरी इक छोटी सी कोशिश तुझ को पाने के लिए,बन गई है मसअला सारे ज़माने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी

  • 11th May 2025

    अपने सहारे उठा!

    झील पतवार वापस न देगी कभी,अपनी कश्ती अब अपने सहारे उठा| कृष्ण बिहारी नूर

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