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दश्त मेरा घर तो नहीं!
मिरे दिमाग़ पे आसेब का असर तो नहीं,गुमाँ गुज़रता है ये दश्त मेरा घर तो नहीं। क़मर अब्बास क़मर
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कंगन दिलाने के लिए!
मैं ‘ज़फ़र’ ता-ज़िंदगी बिकता रहा परदेस में,अपनी घर-वाली को इक कंगन दिलाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
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संजीदा बनाने के लिए!
देर तक हँसता रहा उन पर हमारा बचपना,तजरबे आए थे संजीदा बनाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
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छत टपकती थी!
छत टपकती थी अगरचे फिर भी आ जाती थी नींद,मैं नए घर में बहुत रोया पुराने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
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मैंने अपने गानों को जन्म दिया!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ व्यंग्यकार एवं कवि स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले ही शेयर की है। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की यह कविता – मैंने अपने गानों को जन्म दियाएकदम चुपचाप-अकेले,पर फिर भी एक दिनउन सबके कण्ठ खुले,और…
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आसमाँ ऐसा भी क्या!
आसमाँ ऐसा भी क्या ख़तरा था दिल की आग से,इतनी बारिश एक शोले को बुझाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
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वक़्त होंटों से मिरे!
वक़्त होंटों से मिरे वो भी खुरच कर ले गया,इक तबस्सुम जो था दुनिया को दिखाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
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बच्चा निराले मेरे खेल!
रेत मेरी उम्र मैं बच्चा निराले मेरे खेल,मैं ने दीवारें उठाई हैं गिराने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
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बन गई है मसअला!
मेरी इक छोटी सी कोशिश तुझ को पाने के लिए,बन गई है मसअला सारे ज़माने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी