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वो बेवफ़ा अच्छा लगा!
इस अदू-ए-जाँ को ‘अमजद‘ मैं बुरा कैसे कहूँ, जब भी आया सामने वो बेवफ़ा अच्छा लगा| अमजद इस्लाम अमजद
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नीम-शब की ख़ामोशी
नीम-शब की ख़ामोशी में भीगती सड़कों पे कल, तेरी यादों के जिलौ में घूमना अच्छा लगा| अमजद इस्लाम अमजद
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वो मिला तो सब!
दिल में कितने अहद बाँधे थे भुलाने के उसे, वो मिला तो सब इरादे तोड़ना अच्छा लगा| अमजद इस्लाम अमजद
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चाय में चीनी मिलाना!
चाय में चीनी मिलाना उस घड़ी भाया बहुत, ज़ेर-ए-लब वो मुस्कुराता शुक्रिया अच्छा लगा| अमजद इस्लाम अमजद
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हाथ को होंटों पे रख!
बात तो कुछ भी नहीं थीं लेकिन उस का एक दम, हाथ को होंटों पे रख कर रोकना अच्छा लगा| अमजद इस्लाम अमजद
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सुरमई आँखों के नीचे!
सुरमई आँखों के नीचे फूल से खिलने लगे, कहते कहते कुछ किसी का सोचना अच्छा लगा| अमजद इस्लाम अमजद
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भीड़ में इक अजनबी!
भीड़ में इक अजनबी का सामना अच्छा लगा, सब से छुप कर वो किसी का देखना अच्छा लगा| अमजद इस्लाम अमजद
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उसे अपने होंटों का!
उसे अपने होंटों का लम्स दो कि ये साँस ले, ये जो पेड़ है ये हरा-भरा नहीं हो रहा| अज़हर इक़बाल
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खुला रहने दो!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ साहित्यकार और कवि स्वर्गीय रांगेय राघव जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रांगेय राघव जी की यह कविता – गगन निविड़ घाटीमुझे मिली भूमि सघन माटी;उगी कली बंद,जीवन का छंद रस-लहरी साकार, गंध निराधार,बहता हैअनदेखा समीर,काल-कुहर स्पर्श, पर…