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तुझसे मिलकर हमें!
तुझसे मिलकर हमें रोना था बहुत रोना था,तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया। सुदर्शन फ़ाकिर
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रोनेवालों से कह दो!
रोनेवालों से कह दो उनका भी रोना रोलेंजिनको मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया। सुदर्शन फ़ाकिर
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आप कहते थे के!
आप कहते थे के रोने से न बदलेंगे नसीब,उम्र भर आपकी इस बात ने रोने न दिया। सुदर्शन फ़ाकिर
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वर्ना क्या बात थी!
इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया,वर्ना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया। सुदर्शन फ़ाकिर
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बादल लिखना!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय हरीश निगम जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरीश निगम जी का यह नवगीत – मेहंदी-सुर्खीकाजल लिखनामहका-महकाआँचल लिखना! धूप-धूपरिश्तों केजंगलख़त्म नहींहोते हैंमरुथलजलते मन परबादल लिखना! इंतज़ार केबिखरेकाँटेकाँटे नहींकटेसन्नाटे वंशी लिखनामादल लिखना! (आभार- एक…
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अगर ये तुम ने कहा!
किसे मजाल कहे कोई मुझ को दीवाना,अगर ये तुम ने कहा है तो कोई बात नहीं| राज़ इलाहाबादी
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तुम्ही ने तोड़ दिया है!
तुम्ही ने आइना-ए-दिल मिरा बनाया था,तुम्ही ने तोड़ दिया है तो कोई बात नहीं| राज़ इलाहाबादी
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जहाँ ने छोड़ दिया है!
ये फ़िक्र है कहीं तुम भी न साथ छोड़ चलो,जहाँ ने छोड़ दिया है तो कोई बात नहीं| राज़ इलाहाबादी
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सफ़ीना डूब रहा है!
यही बहुत है कि तुम देखते हो साहिल से,सफ़ीना डूब रहा है तो कोई बात नहीं| राज़ इलाहाबादी
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यही वफ़ा का सिला है!
यही वफ़ा का सिला है तो कोई बात नहीं,ये दर्द तुम ने दिया है तो कोई बात नहीं| राज़ इलाहाबादी