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धूप सड़क की!
आज मैं श्रेष्ठ राजस्थानी एवं हिंदी कवि स्वर्गीय हरीश भादानी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| भादानी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरीश भादानी जी का यह गीत – धूप सड़क की नहीं सहेली जब कोरे मेड़ी ही कोरेछत पसरी पसवाड़े फोरेछ्जवालों से…
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रोना नसीब में है!
रोना नसीब में है तो औरों से क्या गिला,अपने ही सर लिया कोई इल्ज़ाम रो पड़े। सुदर्शन फ़ाकिर
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दो गाम ही चले थे!
राह-ए-वफ़ा में हमको ख़ुशी की तलाश थी,दो गाम ही चले थे के हर गाम रो पड़े। सुदर्शन फ़ाकिर
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अपनी वफ़ा का सोच!
उल्फ़त का जब किसी ने लिया नाम रो पड़े,अपनी वफ़ा का सोच के अंजाम रो पड़े। सुदर्शन फ़ाकिर
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एक दो रोज़ का!
एक दो रोज़ का सदमा हो तो रो लें “फ़ाकिर”,हम को हर रोज़ के सदमात ने रोने न दिया। सुदर्शन फ़ाकिर