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बोलियाँ रह जाएँगी!
सिर्फ़ लफ़्ज़ों को नहीं अंदाज़ भी अच्छा रखो,इस जगत में सिर्फ़ मीठी बोलियाँ रह जाएँगी। आदर्श दुबे
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बेड़ियाँ रह जाएँगी!
इस नए क़ानून का मंज़र यही दिखता है अबपाँव कट जाएँगे लेकिन बेड़ियाँ रह जाएँगी। आदर्श दुबे
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तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से मैं , अपने स्वर में कैफी आज़मी साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ जिसे ‘अर्थ’ फिल्म के लिए जगजीत सिंह जी ने गाया था- तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो! आशा है आपको यह पसंद आएगी, धन्यवाद। *****
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अपना ग़म ले के कहीं
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं निदा फाज़ली साहब की लिखी एक ग़ज़ल अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसे चंदन दास जी ने गाया था- अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाए, घर की बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए। आशा है आपको यह पसंद आएगी,धन्यवाद । ******
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सिसकियाँ रह जाएँगी!
काम करना हो जो कर लो आज की तारीख़ में,आँख नम हो जाएगी फिर सिसकियाँ रह जाएँगी। आदर्श दुबे
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फूल सब ले जाएँगे!
हम कहीं भी हों मगर ये छुट्टियाँ रह जाएँगी,फूल सब ले जाएँगे पर पत्तियाँ रह जाएँगी। आदर्श दुबे
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आप बचाते रहना!
तुम भी ‘मुनीर’ अब उन गलियों से अपने आप को दूर ही रखना,अच्छा है झूटे लोगों से अपना-आप बचाते रहना| मुनीर नियाज़ी
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ख़ुश्बू की दीवार के !
ख़ुश्बू की दीवार के पीछे कैसे कैसे रंग जमे हैं,जब तक दिन का सूरज आए उस का खोज लगाते रहना| मुनीर नियाज़ी
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नक़्श मिटाते रहना!
रात के दश्त में फूल खिले हैं भूली-बिसरी यादों के,ग़म की तेज़ शराब से उन के तीखे नक़्श मिटाते रहना| मुनीर नियाज़ी