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कि क़त्ल-गाह में!
उठा के सर मुझे इतना तो देख लेने दे,कि क़त्ल-गाह में दीवाने आए हैं क्या क्या| कैफ़ी आज़मी
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आवाज़ का घना बादल!
छटा जहाँ से उस आवाज़ का घना बादल,वहीं से धूप ने तलवे जलाए हैं क्या क्या| कैफ़ी आज़मी
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आधी उमर करके धुआं -3
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं, अपने स्वर में स्वर्गीय भारत भूषण जी के इस प्रसिद्ध गीत का अगला अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ- आधी उमर करके धुआं -3 आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद। *****
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तमाम ज़ख़्म-ए-जिगर!
जब उस ने हार के ख़ंजर ज़मीं पे फेंक दिया,तमाम ज़ख़्म-ए-जिगर मुस्कुराए हैं क्या क्या| कैफ़ी आज़मी
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कहीं से लौट के हम!
कहीं से लौट के हम लड़खड़ाए हैं क्या क्या,सितारे ज़ेर-ए-क़दम रात आए हैं क्या क्या| कैफ़ी आज़मी
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तेरा चेहरा है आईने जैसा!
अपने यूटृयूब चैनल के माध्यम से मैं अपने स्वर में पयाम सिद्दीक़ी जी की एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसे जगजीत सिंह जी ने बड़े खूबसूरत ढंग से गाया है- तेरा चेहरा है आईने जैसा, क्यों न देखूं है देखने जैसा! आशा है आपको यह प्रस्तुति पसंद आएगी,धन्यवाद। *****
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सच्च बताना साईं!
आज मैं जम्मू की श्रेष्ठ हिंदी कवियित्री पद्मा सचदेव जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। पद्मा जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है सुश्री पद्मा सचदेव जी की यह कविता – सच्चो सच्च बताना साईंआगे-आगे क्या होना है खेत को बीजूँ न बीजूँपालूँ या न पालूँ रीझेंधनिया-पुदीना…
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अपना ही घर नहीं आया!
हम अब भी दश्त में ख़ेमा लगाए बैठे हैं,हमारे हिस्से में अपना ही घर नहीं आया| अज़हर इक़बाल
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फिर इस के बाद मुझे!
बस एक लम्हे को बे-पैराहन उसे देखा,फिर इस के बाद मुझे कुछ नज़र नहीं आया| अज़हर इक़बाल