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मल के भभूत चेहरे पे!
मल के भभूत चेहरे पे तारों की छाँव का,धोनी रमाए दर पे ये किस के सहर गई| असर लखनवी
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अग्निबीज!
एक बार फिर से आज मैं, श्रेष्ठ हिंदी कवि बाबा नागार्जुन जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। नागार्जुन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नागार्जुन जी की यह कविता– अग्निबीजतुमने बोए थेरमे जूझते,युग के बहु आयामीसपनों में, प्रियखोए थे !अग्निबीजतुमने बोए थे तब के वे…
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क़ीमत और बढ़ती है!
अगर बिकने पे आ जाओ तो घट जाते हैं दाम अक्सर,न बिकने का इरादा हो तो क़ीमत और बढ़ती है| नवाज़ देवबंदी
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अदावत और बढ़ती है!
ज़रूरत में अज़ीज़ों की अगर कुछ काम आ जाओ,रक़म भी डूब जाती है अदावत और बढ़ती है| नवाज़ देवबंदी
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वो दुश्मन क्यूँ न हो!
मिरी कमज़ोरियों पर जब कोई तन्क़ीद करता है,वो दुश्मन क्यूँ न हो उस से मोहब्बत और बढ़ती है| नवाज़ देवबंदी
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हक़ीक़त और बढ़ती!
बुझाने को हवा के साथ गर बारिश भी आ जाए,चराग़-ए-बे-हक़ीक़त की हक़ीक़त और बढ़ती है| नवाज़ देवबंदी
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कोई जब रास्ता रोके!
सफ़र में मुश्किलें आएँ तो जुरअत और बढ़ती है,कोई जब रास्ता रोके तो हिम्मत और बढ़ती है| नवाज़ देवबंदी