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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 17th Aug 2025

    दर्द-भरा गीत थे हम!

    सूने पनघट का कोई दर्द-भरा गीत थे हम,शहर के शोर में क्या तुझ को सुनाई देते| मुनव्वर राना

  • 17th Aug 2025

    बच्चे को मिठाई देते!

    कुछ खिलौने कभी आँगन में दिखाई देते,काश हम भी किसी बच्चे को मिठाई देते| मुनव्वर राना

  • 17th Aug 2025

    शाख़ पे बैठी भोली!

    शाख़ पे बैठी भोली-भाली इक चिड़िया,क्या जाने उस पर भी निशाना लगता है| वसीम बरेलवी

  • 17th Aug 2025

    चाँद अकेला है तो!

    भीड़ में रह कर अपना भी कब रह पाता,चाँद अकेला है तो सब का लगता है| वसीम बरेलवी

  • 17th Aug 2025

    ठोकर में जब सारा!

    प्यार के इस नश्शा को कोई क्या समझे,ठोकर में जब सारा ज़माना लगता है| वसीम बरेलवी

  • 17th Aug 2025

    तस्वीर उतरते ही!

    ज़ेहन से काग़ज़ पर तस्वीर उतरते ही,एक मुसव्विर कितना अकेला लगता है| वसीम बरेलवी

  • 17th Aug 2025

    हाथ तुम्हारा लगता है!

    मैं ही न मानूँ मेरे बिखरने में वर्ना,दुनिया भर को हाथ तुम्हारा लगता है| वसीम बरेलवी

  • 17th Aug 2025

    खेल-तमाशा लगता है!

    आज ये है कल और यहाँ होगा कोई,सोचो तो सब खेल-तमाशा लगता है| वसीम बरेलवी

  • 17th Aug 2025

    रे समुंदर, ओ समुंदर!

    प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- एक अलग दुनिया है अंदर, रे समुंदर, ओ समुंदर। कैसे इतने शांत बने हो, भीतर पाले हुए बवंडर। तुमसे पार न पाया कोईहो वह पोरस, भले सिकंदर। नैया पार लगे नाविक कीयदि न धरो तुम रूप भयंकर। मछली सभी भांति की पालेरंग-बिरंगी, सुघढ़-मनोहर। कितना व्यापक…

  • 16th Aug 2025

    भीड़ में उस को!

    तन्हा हो तो घबराया सा लगता है,भीड़ में उस को देख के अच्छा लगता है| वसीम बरेलवी

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