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दर्द-भरा गीत थे हम!
सूने पनघट का कोई दर्द-भरा गीत थे हम,शहर के शोर में क्या तुझ को सुनाई देते| मुनव्वर राना
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बच्चे को मिठाई देते!
कुछ खिलौने कभी आँगन में दिखाई देते,काश हम भी किसी बच्चे को मिठाई देते| मुनव्वर राना
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रे समुंदर, ओ समुंदर!
प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- एक अलग दुनिया है अंदर, रे समुंदर, ओ समुंदर। कैसे इतने शांत बने हो, भीतर पाले हुए बवंडर। तुमसे पार न पाया कोईहो वह पोरस, भले सिकंदर। नैया पार लगे नाविक कीयदि न धरो तुम रूप भयंकर। मछली सभी भांति की पालेरंग-बिरंगी, सुघढ़-मनोहर। कितना व्यापक…