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कुछ और भी चेहरे!
हम भी तिरी सूरत के परस्तार हैं लेकिन,कुछ और भी चेहरे हमें मर्ग़ूब रहे हैं| जाँ निसार अख़्तर
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जो दर्द किसी नाम से!
उन को न पुकारो ग़म-ए-दौराँ के लक़ब से,जो दर्द किसी नाम से मंसूब रहे हैं| जाँ निसार अख़्तर
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लगता है सफ़ीने से!
तूफ़ान की आवाज़ तो आती नहीं लेकिन,लगता है सफ़ीने से कहीं डूब रहे हैं| जाँ निसार अख़्तर