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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 26th Aug 2025

    रात है या बरात!

    फिर छिड़ी रात बात फूलों की,रात है या बरात फूलों की| मख़दूम मुहिउद्दीन

  • 26th Aug 2025

    कोई दीवाना गलियों में!

    कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा,कोई आवाज़ आती रही रात भर| मख़दूम मुहिउद्दीन

  • 26th Aug 2025

    याद के चाँद दिल में!

    याद के चाँद दिल में उतरते रहे,चाँदनी जगमगाती रही रात भर| मख़दूम मुहिउद्दीन

  • 26th Aug 2025

    याद बन बन के!

    बाँसुरी की सुरीली सुहानी सदा,याद बन बन के आती रही रात भर| मख़दूम मुहिउद्दीन

  • 26th Aug 2025

    रात भर दर्द की शम्अ!

    रात भर दर्द की शम्अ जलती रही,ग़म की लौ थरथराती रही रात भर| मख़दूम मुहिउद्दीन

  • 26th Aug 2025

    आपकी याद आती रही!

    आप की याद आती रही रात भर,चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात भर| मख़दूम मुहिउद्दीन

  • 26th Aug 2025

    इतने बरसों बाद!

    एक बार फिर से आज मैं, श्रेष्ठ नवगीतकार श्री अनूप अशेष जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। अनूप जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अनूप अशेष जी का यह नवगीत- इतने बरसों बाद भले सेलगते गीले घर।। गौरैया के पंख भीग करनिकले पानी…

  • 25th Aug 2025

    कुछ और भी चेहरे!

    हम भी तिरी सूरत के परस्तार हैं लेकिन,कुछ और भी चेहरे हमें मर्ग़ूब रहे हैं| जाँ निसार अख़्तर

  • 25th Aug 2025

    जो दर्द किसी नाम से!

    उन को न पुकारो ग़म-ए-दौराँ के लक़ब से,जो दर्द किसी नाम से मंसूब रहे हैं| जाँ निसार अख़्तर

  • 25th Aug 2025

    लगता है सफ़ीने से!

    तूफ़ान की आवाज़ तो आती नहीं लेकिन,लगता है सफ़ीने से कहीं डूब रहे हैं| जाँ निसार अख़्तर

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