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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 1st Mar 2026

    टूटा पहिया!

    आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी साहित्यकार, संपादक एवं कवि स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। भारती जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की यह कविता– मैंरथ का टूटा हुआ पहिया हूँलेकिन मुझे फेंको मत !…

  • 28th Feb 2026

    आहट जो सुनाई दी है!

    आहट जो सुनाई दी है हिज्र की शब की है,ये राय अकेली मेरी नहीं है सब की है| शहरयार

  • 28th Feb 2026

    खिले चमन में गुलाब इतने!

    महक उठे रंग-ए-सुर्ख़ जैसे,खिले चमन में गुलाब इतने| मुनीर नियाज़ी

  • 28th Feb 2026

    वो निग़ाहें सलीब हैं!

    अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से मैं अपने स्वर में स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक ग़ज़ल के कुछ शेर प्रस्तुत कर रहा हूँ- वो निग़ाहें सलीब हैं, हम बहुत बदनसीब हैं! आशा है आपको यह पसंद आएंगे,धन्यवाद। ********

  • 28th Feb 2026

    चराग़ ओ आफ़ताब ग़ुम!

    अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं सुदर्शन फ़ाकिर जी की लिखी यह ग़ज़ल अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसे जगजीत सिंह जी ने बहुत मोहक अंदाज़ में गाया है- चराग़ ओ आफ़ताब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी आशा है आपको यह पसंद आएगी, धन्यवाद। *******

  • 28th Feb 2026

    इस तरह तो!

    आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ गीतकार श्री बालस्वरूप राही जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। राही जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत– इस तरह तो दर्द घट सकता नहींइस तरह तो वक़्त कट सकता नहींआस्तीनों से…

  • 27th Feb 2026

    बस इक नज़र में!

    बस इक नज़र में हज़ार बातें, फिर उस से आगे हिजाब इतने| मुनीर नियाज़ी

  • 27th Feb 2026

    कि हम जो थे!

    हिसाब देना पड़ा हमें भी,कि हम जो थे बे-हिसाब इतने। मुनीर नियाज़ी

  • 27th Feb 2026

    इन्हें प्रणाम करो -3

    अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से मैंने स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी की इस व्यंग्य कविता के दो भाग पहले शेयर किए हैं, आज कविता का तीसरा और अंतिम भाग प्रस्तुत कर रहा हूँ- इन्हें प्रणाम करो ये बड़े महान हैं-3 आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद। ********

  • 27th Feb 2026

    कभी न ख़ूबी का !

    कभी न ख़ूबी का ध्यान आया,हुए जहाँ में ख़राब इतने| मुनीर नियाज़ी

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