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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 21st Sep 2025

    क्या भलाई की!

    ज़िंदगी जैसे-तैसे काटनी है,क्या भलाई की क्या बुराई की| राहत इंदौरी

  • 21st Sep 2025

    मंज़िलें चूमती हैं!

    मंज़िलें चूमती हैं मेरे क़दम,दाद दीजे शिकस्ता-पाई की| राहत इंदौरी

  • 21st Sep 2025

    अब ज़रूरत नहीं!

    सोए रहते हैं ओढ़ कर ख़ुद को,अब ज़रूरत नहीं रज़ाई की| राहत इंदौरी

  • 21st Sep 2025

    ये शुरूआ’त है!

    टूट कर हम मिले हैं पहली बार,ये शुरूआ’त है जुदाई की| राहत इंदौरी

  • 21st Sep 2025

    कोई सूरत नहीं!

    खुले रहते हैं सारे दरवाज़े,कोई सूरत नहीं रिहाई की| राहत इंदौरी

  • 21st Sep 2025

    सैकड़ों बार बेवफ़ाई!

    मैं ने दुनिया से मुझ से दुनिया ने,सैकड़ों बार बेवफ़ाई की| राहत इंदौरी

  • 21st Sep 2025

    हम ने ख़ुद अपनी!

    हम ने ख़ुद अपनी रहनुमाई की,और शोहरत हुई ख़ुदाई की| राहत इंदौरी

  • 21st Sep 2025

    बॉलकनी में वृद्धा!

    प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- लोग चांद में बैठी देखते हैंजिस वृद्धा को रात में,मुझे वह सुबह-सवेरेसामने की बॉलकनी मेंदिखाई देती है। पता नहीं कबआ जाती है वहाँ,कोई मिलेचांद की वृद्धा कोपहचानने वालातो पूछूंक्या ये वही है। एक कुर्सी रखी हैबॉलकनी मेंवहीं आकर बैठ जाती हैसुबह-सवेरेमोबाइल भी नहीं होताउसके हाथ…

  • 20th Sep 2025

    हम ने सदियों इन्हीं!

    आज इक दाना-ए-गंदुम के भी हक़दार नहीं,हम ने सदियों इन्हीं खेतों पे हुकूमत की है| राहत इंदौरी

  • 20th Sep 2025

    हम ने पलकों के!

    सर उठाए थीं बहुत सुर्ख़ हवा में फिर भी,हम ने पलकों के चराग़ों की हिफ़ाज़त की है| राहत इंदौरी

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