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होता जाता दूर निवाला!
अपनी एक नई रचना आज शेयर कर रहा हूँ, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- कम होती जाती हैं खुशियांहोता जाता दूर निवालादोष तराजू में भी है कुछकुछ है कुटिल तौलने वाला। सभी साज़-सामान यहाँ हैंगीता और क़ुरान यहाँ हैंपर जिसको मानव कह पाएंआखिर वो इंसान कहाँ है, पोथी में उपदेश भरे हैंझूठा उन्हें बोलने वाला।…
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हल्का सा वो पर्दा भी!
ग़श खा के गिरे मूसा अल्लाह-री मायूसी,हल्का सा वो पर्दा भी दीवार नज़र आया| फ़िराक़ गोरखपुरी
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क्या आख़री लम्हों में!
तू ने भी तो देखी थी वो जाती हुई दुनिया,क्या आख़री लम्हों में बीमार नज़र आया| फ़िराक़ गोरखपुरी
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हो सब्र कि बेताबी!
हो सब्र कि बेताबी उम्मीद कि मायूसी,नैरंग-ए-मोहब्बत भी बे-कार नज़र आया| फ़िराक़ गोरखपुरी
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मेरी दो और रचनाएं- ‘पिता के नाम’ और ‘सन्नाटा शहर में’
यू ट्यूब पर मेरा नया वीडिओ, जिस पर दो कविताओं का पाठ शामिल है।यदि आप मेरे यू ट्यूब चैनल को सब्स्क्राइब करेंगे तो आप मेरी कविताओं को भी सुन पाएंगे और मेरे गाए हुए मुकेश जी के और अन्य गायकों के गीत भी सुन पाएंगे आपसे विनम्र अनुरोध है कि मेरे चैनल को सब्स्क्राइब करके…
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हर बार छुपा कोई!
दीदार में इक तुर्फ़ा दीदार नज़र आया, हर बार छुपा कोई हर बार नज़र आया| फ़िराक़ गोरखपुरी