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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 24th Sep 2025

    होता जाता दूर निवाला!

    अपनी एक नई रचना आज शेयर कर रहा हूँ, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- कम होती जाती हैं खुशियांहोता जाता दूर निवालादोष तराजू में भी है कुछकुछ है कुटिल तौलने वाला। सभी साज़-सामान यहाँ हैंगीता और क़ुरान यहाँ हैंपर जिसको मानव कह पाएंआखिर वो इंसान कहाँ है, पोथी में उपदेश भरे हैंझूठा उन्हें बोलने वाला।…

  • 23rd Sep 2025

    हल्का सा वो पर्दा भी!

    ग़श खा के गिरे मूसा अल्लाह-री मायूसी,हल्का सा वो पर्दा भी दीवार नज़र आया| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 23rd Sep 2025

    क्या आख़री लम्हों में!

    तू ने भी तो देखी थी वो जाती हुई दुनिया,क्या आख़री लम्हों में बीमार नज़र आया| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 23rd Sep 2025

    हो सब्र कि बेताबी!

    हो सब्र कि बेताबी उम्मीद कि मायूसी,नैरंग-ए-मोहब्बत भी बे-कार नज़र आया| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 23rd Sep 2025

    मेरी दो और रचनाएं- ‘पिता के नाम’ और ‘सन्नाटा शहर में’

    यू ट्यूब पर मेरा नया वीडिओ, जिस पर दो कविताओं का पाठ शामिल है।यदि आप मेरे यू ट्यूब चैनल को सब्स्क्राइब करेंगे तो आप मेरी कविताओं को भी सुन पाएंगे और मेरे गाए हुए मुकेश जी के और अन्य गायकों के गीत भी सुन पाएंगे आपसे विनम्र अनुरोध है कि मेरे चैनल को सब्स्क्राइब करके…

  • 23rd Sep 2025

    जब छेड़ पर आमादा!

    छालों को बयाबाँ भी गुलज़ार नज़र आया,जब छेड़ पर आमादा हर ख़ार नज़र आया| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 23rd Sep 2025

    हर बार छुपा कोई!

    दीदार में इक तुर्फ़ा दीदार नज़र आया, हर बार छुपा कोई हर बार नज़र आया| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 23rd Sep 2025

    क्या सोच के हम!

    बढ़ती ही चली जाती है तन्हाई हमारी,क्या सोच के हम वादी-ए-इंकार में आए| शहरयार

  • 23rd Sep 2025

    ये आग हवस की है!

    ये आग हवस की है झुलस देगी इसे भी,सूरज से कहो साया-ए-दीवार में आए| शहरयार

  • 23rd Sep 2025

    यहाँ बेकार में आए!

    सच ख़ुद से भी ये लोग नहीं बोलने वाले,ऐ अहल-ए-जुनूँ तुम यहाँ बेकार में आए| शहरयार

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