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148. कच्ची दीवार हूँ, ठोकर न लगाना मुझको
इंसान परिस्थितियों के अनुसार क्या-क्या नहीं बनता और अपने आपको किस-किस रूप में महसूस नहीं करता। कभी-कभी जीवन में ऐसा भी लगता है कि अब बहुत सहन कर लिया, एक झटका और लगा तो टूटकर बिखर जाएंगे। अरेे कुछ नहीं ज़नाब, बस असरार अंसारी जी की एक गज़ल याद आ रही थी, जिसको गुलाम अली…
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147. खुशबू जैसे लोग
अभी कल ही अपने एक पुराने कवि-मित्र का ज़िक्र किया था, मुद्दत हो गई उनसे मिले लेकिन आज भी याद आती है। हाँ कुछ लोग ऐसे भी होते हैं लोग जो लंबे समय बाद भी यादों में खटकते रहते हैं, हालांकि उनको भुला देना ही बेहतर होता है, मैं यह कहना चाहूंगा कि मेरे जीवन…
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146. इस सूने उदास मौसम में, कुछ तो यार करें
आज फिर पुराने दिनों में झांकने का मन हो रहा है, एक मित्र की याद आ रही है। बात है 1980 से 1983 के बीच की, जब मैं आकाशवाणी, जयपुर में अनुवादक के पद पर कार्यरत था और वहाँ बने कवि मित्रों में से एक थे- श्री कृष्ण कल्पित, वे उस समय जयपुर विश्वविद्यालय से…
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145. तेरा दर्द ना जाने कोय
जीवन में अब तक, बहुत से शहरों और क्षेत्रों में रहने का अवसर मिला, हर स्थान की अपनी विशेषता और कमियां हैं। लेकिन कुछ बातें हैं जो भारत में, हर जगह समान रूप से होती हैं। जैसे रात में आप उठें और बाथ-रूम जाएं तो आपको कुत्तों के रोने का शोर सुनाई देगा। यह शोर…
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144. बसंती पागल पवन – राज कपूर
आज एक बार फिर मेरे उस्ताद राज कपूर जी की याद आ रही है, फिल्म- ‘जिस देश में गंगा बहती है’ और उसके एक गीत के बहाने। जबलपुर में जब भेड़ाघाट जाते हैं, तब वहाँ नाव वाले घुमाते हुए बताते हैं, कि यहाँ ‘मेरा नाम राजू’ गाने की शूटिंग हुई थी और यहाँ पद्मिनी ने…
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143. मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
आज एक बार फिर से निदा फाज़ली साहब की एक गज़ल शेयर करने का मन हो रहा है। गज़ल में अपनी बात कहने का सलीका, और जिस बारीकी से फीलिंग्स को कविता में उकेरा जाता है, यह उनकी पहचान रही है। हम सभी इस दुनिया में जी रहे हैं, किसी के पास पैसा है, रुतबा…
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142. देखिये आपने फिर प्यार से देखा मुझको!
आज राज कपूर जी की फिल्म – ‘फिर सुबह होगी’ का एक युगल गीत याद आ रहा है, जिसे साहिर लुधियानवी जी ने लिखा है, खैय्याम जी ने इसका संगीत तैयार किया है और इस गीत को मुकेश जी और आशा भौंसले जी ने गाया है। गीत का विषय, जैसे कि आम तौर पर होता…
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141. दिल से दिल की बात कही और रो लिए।
आज लता मंगेशकर जी की गाई एक गज़ल याद आ रही है, जिसे राजेंदर कृष्ण जी ने लिखा है और इसके लिए संगीत दिया है, मदन मोहन जी ने। बड़े सुंदर बोल हैं, दिल को छूने वाले जिनको लता जी की आवाज और मदन मोहन जी के संगीत ने बहुत प्रभावशाली बना दिया है। कुल…
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140. एक छलिया आस के पीछे, दौड़े तो यहाँ तक आए!
चलो एक ख्वाब बुनते हैं, नई एक राह चुनते हैं। अंधेरा है सफर तो क्या, कठिन है रहगुज़र तो क्या, हमारा फैसला तो है, दिलों में हौसला तो है। बहुत से ख्वाब हैं, जिनको हक़ीकत में बदलना है, अभी एक साथ में है कल इसे साकार करना है, निरंतर यह सफर ख्वाबों का, इनके साथ…
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139. भाषा की डुगडुगी बजाते हैं!
कुछ ऐसी पुरानी कविताएं, जो पहले कभी शेयर नहीं की थीं, वे अचानक मिल गईं और मैंने शेयर कर लीं, आज इसकी आखिरी कड़ी है। अपनी बहुत सी रचनाएं मैं शुरू के ब्लॉग्स में शेयर कर चुका हूँ, कोई इधर-उधर बची होगी तो फिर शेयर कर लूंगा। आज की रचना हल्की-फुल्की है, गज़ल के छंद…