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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 25th May 2017

    12. सफर दरवेश है ऐ ज़िंदगी….

    दिल्ली में रहते हुए मैंने पीताम्बर बुक डिपो और दिल्ली प्रेस में दो प्राइवेट नौकरी की थीं और उसके बाद 6 वर्ष  तक उद्योग मंत्रालय में कार्य किया, जिसमें से मैं 3 वर्ष तक संसदीय राजभाषा समिति में डेपुटेशन पर भी रहा। खैर फिलहाल तो दिल्ली प्रेस की ही बात चल रही है। कुछ साहित्यिक…

  • 24th May 2017

    11. हम शंटिंग ट्रेन हो गए

    पीताम्बर बुक डिपो में कुल मिलाकर मैं एक साल तक रहा, उसके बाद मैंने फैसला कर लिया कि अब यहाँ अधिक समय तक नहीं रहूंगा। अब तक इतना आत्मविश्वास आ गया था कि मैं इससे बेहतर काम खोज सकता हूँ। और हुआ भी ऐसा, यह काम छोड़ने के बाद एक महीने के अंदर ही दिल्ली…

  • 23rd May 2017

    10. रोज़गार दफ्तर की फाइलें भरें

     ऐसा हुआ कि आगे पढ़ाई जारी रखने की तो गुंजाइश नहीं बची थी और तुरंत कोई काम तलाशने की भी ज़रूरत थी। उन दिनों हमारे पड़ौस में ही एक सज्जन रहते थे, जो व्यवसायी थे और उनके कुछ संपर्क थे, सो उन्होंने एक संदर्भ दिया और उनकी सलाह पर मैंने चांदनी चौक में जाकर संपर्क…

  • 22nd May 2017

    9. झूमती चली हवा

    लगातार सीधी राह पर चलते जाने से भी काफी थकान हो जाती है, अतः थोड़ा इधर-उधर टहल लेते हैं। मैं यह भी बता दूं कि यहाँ अपनी निजी ज़िंदगी का विवरण देना मेरा उद्देश्य नहीं है। पात्र यदि कहीं आए हैं तो वे या तो पृष्ठभूमि के तौर पर आए हैं, या ऐसे पात्र आए…

  • 22nd May 2017

    8. कालेज के दिन

      जैसी बात हुई थी, अब बारी है कालेज के दिनों के बारे में बात करने की। बाबूराम स्कूल में 6 साल रहा और अच्छा खासा जुड़ाव रहा स्कूल से, इसलिए स्कूल के बारे में, वहाँ के शिक्षकों के बारे में भी मैंने कुछ बात की। यहाँ स्पष्ट कह दूं कि कालेज से मेरा कोई…

  • 21st May 2017

    7. बाबूराम स्कूल

    अब स्कूल के बारे में बात कर लें। कक्षा 1 से 5 तक गौशाला वाले सनातन धर्म स्कूल के बारे में तो बताने को कुछ नहीं है। बाबूराम स्कूल के बारे में ही बात करूंगा जहाँ मेंने कक्षा 6 से 11 तक की पढ़ाई की थी। कुछ चित्र जो मस्तिष्क में आते हैं, वे धीरे-धीरे…

  • 20th May 2017

    6. परला घर

    अपने मोहल्ले में कुछ समय तो और बिताना होगा। आज अपने वकील भाई साहब के बारे में बात कर लेते हैं, जिनके पास हम जाकर बसे थे इस मोहल्ले- भोलानाथनगर, शाहदरा में। वकील साहब मेरे मामा के बेटे होने के नाते मेरे बड़े भाई लगते थे, लेकिन असल में उनके बेटे मेरे हमउम्र, मुझसे एक-दो…

  • 19th May 2017

    मोहल्ला मेरा

    अब थोड़ा समय उस मोहल्ले को भी दे दें, जो लगभग 25 वर्ष तक मेरा ठिकाना था। जैसा मैंने अपने पिछले ब्लॉग में लिखा था, दरियागंज छोड़कर हम भोलानाथ नगर, शाहदरा में जाकर बसे और वहाँ पर पहली कक्षा से मेरी पढ़ाई शुरू हुई। भोलानाथ नगर आने का एक कारण यह भी था कि मेरे…

  • 18th May 2017

    इब्तदा कुछ इस तरह

      किसी ने फिर न सुना, दर्द के फसाने को मेरे न होने से राहत हुई ज़माने को।  खैर दर्द का फसाना सुनाने का मेरा कोई इरादा नहीं है। ज़िंदगी के साथ, इस राह में मिले कुछ विशेष पात्रों, विशेष परिस्थितियों के साथ हुए ऐसे अंतर्संवाद, जिनमें मुझे ऐसा लगता है कि अन्य लोगों की…

  • 16th May 2017

    चल अकेला

    हज़ारों मील लंबे रास्ते तुझको बुलाते, यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते है कौन सा वो इंसान यहाँ पर जिसने दुख ना झेला। चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला । मुकेश जी के गाये इस गीत ने जीवन में बहुत बार हिम्मत दी है। वैसे कुछ मामलों में इंसान को बड़ी जल्दी सबक मिलता…

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