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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 30th Oct 2017

    98. आंखों में नमी, हंसी लबों पर!

    बहुत सी बार ऐसा होता है कि कोई कविता शुरू करते हैं, कुछ लाइन लिखकर रुक जाते हैं। फिर आगे नहीं बढ़ पाते, लेकिन वो लाइनें भी दिमाग से नहीं मिट पातीं। अभी दिवाली आकर गई है, दीपावली, दिवाली कहने से ‘दिवाला’ याद आता है, हालांकि वो भी बड़े रईसों की चीज़ है, सामान्य आदमी…

  • 27th Oct 2017

    97. विकास प्राधिकरण!

    आज लखनऊ का एक सरकारी विभाग याद आ गया, जिससे काफी वर्षों पहले वास्ता पड़ा था, 2002 के आसपास, और इस विभाग की याद ऐसी तेजी से आई कि मैं जो अभी एक अनुवाद के काम में लगा हूँ, उसको बीच में छोड़कर ही इस अनुभव को शेयर कर रहा हूँ, उसके बाद अनुवाद आगे…

  • 24th Oct 2017

    96. उसके होठों पे कुछ कांपता रह गया!

    आज वसीम बरेलवी साहब की एक गज़ल याद आ रही है, बस उसके शेर एक-एक करके शेयर कर लेता हूँ। बड़ी सादगी के साथ बड़ी सुंदर बातें की हैं, वसीम साहब ने इस गज़ल में। पहला शेर तो वैसा ही है, जैसा हम कहते हैं, कोई बहुत सुंदर हो तो उसको देखकर- आपको देख कर…

  • 18th Oct 2017

    95. तव मूरति विधु उर बसहि, सोई स्यामता आभास।

    आज फिर से  प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-  आज गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस का एक अत्यंत प्रेरक प्रसंग याद कर लेते हैं। आजकल नियोजक अपने कर्मचारियों का चयन करते समय तथा बाद में अनेक अवसरों पर उनका मनोवैज्ञानिक परीक्षण करते हैं। श्रीराम जी को लंका पर चढ़ाई करनी थी और उससे…

  • 17th Oct 2017

    94. वो कौन था, वो कहाँ का था क्या हुआ था उसे!

    आज शहरयार जी की एक गज़ल के बहाने आज के हालात पर चर्चा कर लेते हैं। इससे पहले दुश्यंत जी के एक शेर को एक बार फिर याद कर लेता हूँ- इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां। आज की ज़िंदगी इतनी आपाधापी से…

  • 16th Oct 2017

    93. मेरी बेबाक तबीयत का तकाज़ा है कुछ और!

    मुकेश जी का गाया एक प्रायवेट गाना याद आ रहा है- मेरे महबूब, मेरे दोस्त, नहीं ये भी नहीं मेरी बेबाक तबीयत का तकाज़ा है कुछ और। हाँ मैं दीवाना हूँ चाहूँ तो मचल सकता हूँ, खिलवत-ए-हुस्न के कानून बदल सकता हूँ, खार तो खार हैं, अंगारों पे चल सकता हूँ, मेरे महबूब, मेरे दोस्त,…

  • 14th Oct 2017

    92. फिर से मेरा ख्वाब-ए-जवानी थोड़ा सा दोहराए तो!

    अतीत में रहना अक्सर लोगों को अच्छा लगता है, मेरी उम्र के लोगों को और भी ज्यादा। कुछ लोग तो जब मौका मिलता है अतीत में जाकर दुबक जाते हैं, या ऐसा कहते रहते हैं, हमारे समय में तो ऐसा होता है। वैसे मेरा तो यही प्रयास है कि हर समय, मेरा समय रहे, लेकिन…

  • 11th Oct 2017

    91. हाथ खाली हैं मगर व्यापार करता हूँ!

    बचपन में चंदामामा पत्रिका में विक्रम और वैताल की कहानियां पढ़ा करता था, जिनकी शुरुआत इस प्रकार होती थी- ‘विक्रमादित्य ने जिद नहीं छोड़ी’ और फिर अपनी ज़िद के कारण जब वह वैताल को लादकर चलता है, तब वैताल उसे कहानी सुनाता है और बीच में टोकने पर वह फिर वापस उड़कर चला जाता है।…

  • 9th Oct 2017

    90. मेरे नाम से खत लिखती है तुमको मेरी तन्हाई!

    पिछला ब्लॉग लिखने का जब खयाल आया था, तब मन में एक छवि थी, बाद में लिखता गया और वह मूल छवि जिससे लिखने का सोचा था भूल ही गया, तन्हाई का यही तो  मूल भाव है कि लोग अचानक भूल जाते हैं। वह बात अब कर लेता हूँ। कुछ समय पहले प्रसिद्ध अभिनेता विनोद…

  • 8th Oct 2017

    89. हाय क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले!

    जीवन के जो अनुभव सिद्ध सिद्धांत हैं, वही अक्सर कविता अथवा शायरी में भी आते हैं, लेकिन ऐसा भी होता है कि कवि-शायर अक्सर खुश-फहमी में, बेखुदी में भी रहते हैं और शायद यही कारण है कि दिल टूटने का ज़िक्र शायरी में आता है या यह कहा जाता है- मुझे तुमसे कुछ भी न…

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