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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 3rd Oct 2025

    तुम ने कह दी है!

    लोग कहते थे कि ये बात नहीं कहने की,तुम ने कह दी है तो कहने की सज़ा लो यारो| दुष्यंत कुमार

  • 3rd Oct 2025

    कैसे आकाश में!

    कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीअ‘त से उछालो यारो| दुष्यंत कुमार

  • 3rd Oct 2025

    आज संदूक़ से वो !

    आज सीवन को उधेड़ो तो ज़रा देखेंगे,आज संदूक़ से वो ख़त तो निकालो यारो| दुष्यंत कुमार

  • 3rd Oct 2025

    इस बहकती हुई!

    रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया,इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो| दुष्यंत कुमार

  • 3rd Oct 2025

    आज सय्याद को!

    लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे,आज सय्याद को महफ़िल में बुला लो यारो| दुष्यंत कुमार

  • 3rd Oct 2025

    भाव हमारे, दुर्ग तुम्हारे।

    आज प्रस्तुत है एक ग़ज़ल, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- ना ये टूटे, ना ये हारेभाव हमारे, दुर्ग तुम्हारे। जब भी ऊंचे सपने देखेभटके हैं हम मारे-मारे। बांधे से ये कब बंधते हैंभाव उदधि, नदिया के धारे। आखिर शांत बैठना होगा,कितना तुम उड़ते हो प्यारे स्लेट पर लिखावट जैसे हैंक्षणभंगुर संकल्प हमारे। बैठो कुछ पल…

  • 2nd Oct 2025

    इस कबूतर को ज़रा!

    दर्द-ए-दिल वक़्त को पैग़ाम भी पहुँचाएगा, इस कबूतर को ज़रा प्यार से पालो यारो| दुष्यंत कुमार

  • 2nd Oct 2025

    ये जो शहतीर है!

    ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो,अब कोई ऐसा तरीक़ा भी निकालो यारो| दुष्यंत कुमार

  • 2nd Oct 2025

    तुझे मैं कैसे बताऊँ!

    तुझे मैं कैसे बताऊँ कि शाम होते ही,उदासी कमरे के ताक़ों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना

  • 2nd Oct 2025

    मगर ये ओस भी!

    चली थी देखने सूरज की बद-मिज़ाजी को,मगर ये ओस भी फूलों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना

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