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आज संदूक़ से वो !
आज सीवन को उधेड़ो तो ज़रा देखेंगे,आज संदूक़ से वो ख़त तो निकालो यारो| दुष्यंत कुमार
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इस बहकती हुई!
रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया,इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो| दुष्यंत कुमार
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आज सय्याद को!
लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे,आज सय्याद को महफ़िल में बुला लो यारो| दुष्यंत कुमार
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भाव हमारे, दुर्ग तुम्हारे।
आज प्रस्तुत है एक ग़ज़ल, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- ना ये टूटे, ना ये हारेभाव हमारे, दुर्ग तुम्हारे। जब भी ऊंचे सपने देखेभटके हैं हम मारे-मारे। बांधे से ये कब बंधते हैंभाव उदधि, नदिया के धारे। आखिर शांत बैठना होगा,कितना तुम उड़ते हो प्यारे स्लेट पर लिखावट जैसे हैंक्षणभंगुर संकल्प हमारे। बैठो कुछ पल…
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तुझे मैं कैसे बताऊँ!
तुझे मैं कैसे बताऊँ कि शाम होते ही,उदासी कमरे के ताक़ों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना