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ऐसे भी ज़माने आये हैं!
होठों पे तबस्सुम हल्क़ा सा आँखों में नमी सी है ‘फ़ाकिर’हम अहले-मोहब्बत पर अक्सर ऐसे भी ज़माने आये हैं। सुदर्शन फ़ाकिर
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सोच रहे हैं मुद्दत से!
हम सोच रहे हैं मुद्दत से अब उम्र गुज़ारें भी तो कहाँ,सहरा में ख़ुशी के फूल नहीं शहरों में ग़मों के साये हैं। सुदर्शन फ़ाकिर
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लंबी टैक्सी यात्रा!
आज प्रस्तुत है एक और गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- बढ़ते रहे निकट मंज़िल केआते रहे नींद के झोंके। रस्ते हैं हमको अनजानेकहाँ-किधर सब चालक जाने,बस मालूम कहाँ जाना हैगूगल कहता वह हम मानें सिग्नल हमें चलाए, रोके। यात्राएं जीवन का हिस्सा कभी कभी बन जातीं किस्साएक जगह कब तक रह लेंगे बिना सहे…
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हम लोग वहीं से लौटे!
बुतख़ाना समझते हो जिसको पूछो न वहाँ क्या हालत है,हम लोग वहीं से लौटे हैं बस शुक्र करो लौट आये हैं। सुदर्शन फ़ाकिर
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पत्थर के ही इंसाँ पाये!
पत्थर के ख़ुदा पत्थर के सनम पत्थर के ही इंसाँ पाये हैं,तुम शहरे-मोहब्बत कहते हो हम जान बचा कर आये हैं। सुदर्शन फ़ाकिर
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दुनिया की तमन्ना थी!
दुनिया की तमन्ना थी कभी हम को भी ‘फ़ाकिर’,अब ज़ख़्म-ए-तमन्ना की दवा ढूँढ रहे हैं। सुदर्शन फ़ाकिर
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ये भी तो सज़ा है!
ये भी तो सज़ा है कि गिरफ़्तार-ए-वफ़ा हूँक्यूँ लोग मोहब्बत की सज़ा ढूँढ रहे हैं। सुदर्शन फ़ाकिर
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हम अपने गुनाहों में!
कुछ देर ठहर जाइये बंदा-ए-इन्साफ़,हम अपने गुनाहों में ख़ता ढूँढ रहे हैं। सुदर्शन फ़ाकिर
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बुढ़िया!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। वाजपेयी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता – बुढ़िया की झोली मेंकुछ फल थे सूखे हुए,कुछ दबी हुई आकांक्षाएँ,कुछ अनकहे रह…
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हम लोग भी नादाँ हैं!
दुनिया से वफ़ा करके सिला ढूँढ रहे हैं,हम लोग भी नादाँ हैं ये क्या ढूँढ रहे हैं। सुदर्शन फ़ाकिर