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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th Dec 2017

    113. तानसेन

    आज तानसेन से जुड़ा एक प्रसंग याद आ रहा है, जो कहीं सुना या पढ़ा था। अकबर के दरबार में तानसेन गाते थे और सभी मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे। अकबर उनकी भरपूर तारीफ करते, कहते तानसेन आप कितना सुंदर गाते हो, एक दूसरी ही दुनिया में ले जाते हो। आपके जैसा कोई नहीं है। एक…

  • 6th Dec 2017

    112. बच्चा स्कूल जा रहा है!

    आज बिना किसी भूमिका के, निदा फाज़ली साहब की एक नज़्म शेयर कर रहा हूँ, यह नज़्म खुद इतना कहती है कि मैं उसके आगे क्या कह पाऊंगा! बच्चा जब स्कूल जाता है, शिक्षा प्राप्त करता है, अपने लिए और अपने समय के लिए, देश के लिए, दुनिया के लिए सपने बुनता है, उससे ही…

  • 5th Dec 2017

    111. परदेसियों को है एक दिन जाना!

    विख्यात फिल्म अभिनेता शशि कपूर नहीं रहे। वैसे तो वे लंबे समय से बीमार थे, काफी दिन पहले जब उनको दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्रदान किया गया था, तब वह भी उनके अपने स्थान पर दिया गया था और वे उस समय भी व्हील चेयर पर आए थे। कुछ यह कपूर परिवार में लगभग सभी…

  • 3rd Dec 2017

    110. कभी रो के मुस्कुराये, कभी मुस्कुरा के रोये!

    हिंदी फिल्मों के कुछ ऐसे पुराने गीत हैं, जो आज की तारीख में भले ही बहुत ज्यादा सुनने को नहीं मिलते हों, लेकिन जब अचानक सुनने को मिल जाते हैं, तो सुनकर लगता है कि क्या शायर ने अपना दिल उंडेलकर रख  दिया है और गायक, संगीतकार ने कितने मन से इसको प्रस्तुत किया है।…

  • 2nd Dec 2017

    109. एक ज़ख्म भर गया था, इधर ले के आ गया!

    आज सुदर्शन फाकिर जी की एक  गज़ल के बहाने से बात करते हैं, जिसको जगजीत सिंह जी ने बड़े सुंदर तरीके से गाया है। चलिए पहले यह गज़ल देख लेते हैं- शायद मैं ज़िंदगी की सहर ले के आ गया, क़ातिल को आज अपने ही घर ले के आ गया। ता उम्र ढूंढ़ता रहा मंज़िल…

  • 1st Dec 2017

    108 . जिसकी आवाज़ रुला दे, मुझे वो साज़ न दो!

    अपने प्रिय गायक मुकेश जी के दो गीत एक साथ याद आ रहे हैं, एक है- ‘पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो, मुझे इससे अपनी खबर मिल रही है’ और दूसरा है- ‘मुझको इस रात की तनहाई में आवाज़ न दो!’ दो एकदम विपरीत स्थितियां हैं, लेकिन जीवन में लगभग सभी लोग इन एकदम विपरीत मनः…

  • 29th Nov 2017

    107. ये बाज़ी हमने हारी है, सितारो तुम तो सो जाओ!

    आज क़तील शिफाई जी की एक गज़ल याद आ रही है, क्या निराला अंदाज़ है बात कहने का! शायर महोदय, जिनकी नींद उड़ गई है परेशानियों के कारण, वो रात भर जागते हैं, आसमान की तरफ देखते रहते हैं और उनको लगता है कि सितारे भी उनके दुख में आज जाग रहे हैं, रोज तो…

  • 21st Nov 2017

    106. मेरे क़ातिल ने कहीं जाम उछाले होंगे!

    अभिव्यक्ति, कविता, शेर-ओ-शायरी, ये सब ऐसे काम नहीं है कि जब चाहा लिख लिया और उसमें गुणवत्ता भी बनी रहे। दो शेर याद आ रहे हैं इस संदर्भ में- हम पे दुखों के पर्बत टूटे, तब हमने दो-चार कहे, उसपे भला क्या बीती होगी, जिसने शेर हजार कहे।               (डॉ. बालस्वरूप राही) एक अच्छा शेर…

  • 17th Nov 2017

    105. जय पद्मावती!

    अब नया मुद्दा रानी पद्मावती का मिल गया है, जिस पर देश भर के घटिया लोग एकजुट हो जाएंगे, हो गए हैं। मैंने पहले भी लिखा है कि अगर आज मुंशी प्रेमचंद जिंदा होते तो न जाने कितने मुक़द्मे झेल रहे होते। सबसे बड़ी बात यह है कि आज आप कोई बदतमीज़ी करो, किसी सार्वजनिक…

  • 14th Nov 2017

    104. शत्रु भैया के बहाने!

    शत्रु भैया, याने शत्रुघ्न सिन्हा जी के बहाने बात कर लेते हैं आज। बहुत अच्छे अभिनेता रहे हैं, किसी समय इनकी मार्केट अमिताभ जी से ज्यादा थी, लेकिन जैसा वे कहते हैं कुछ गलत निर्णय और सब कुछ हाथ से निकल गया। मैं, पटना के कदम कुआं में, शत्रु भैया के पड़ौस में तो होकर…

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