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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 9th Dec 2025

    खेल ये बाज़ार का!

    प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- खेल ये बाज़ार का, कुछ दिनबहुत अच्छा लगा! खूब बिके हम, खूब खरीदा, लोगों को, सामानों को, गोदामों में जमा कियासामानों को, परिधानों कोकिंतु जब होने लगा ये सच, हमें धक्का लगा। मिथ्या है ये जगत यही तो सुनते हम हैं आए चालें ऊपर…

  • 9th Dec 2025

    गधे ही गधे हैं!

    अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं स्वर्गीय ओम प्रकाश आदित्य जी की एक प्रसिद्ध हास्य कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ- इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं जिधर देखता हूँ, गधे ही गधे हैं। आशा है आपको यह पसंद आएगी, धन्यवाद। *****

  • 8th Dec 2025

    बिखर न जाए कहीं!

    न मिला कर उदास लोगों से,हुस्न तेरा बिखर न जाए कहीं| नासिर काज़मी

  • 8th Dec 2025

    आज देखा है तुझ को!

    आज देखा है तुझ को देर के ब’अद,आज का दिन गुज़र न जाए कहीं| नासिर काज़मी

  • 8th Dec 2025

    तू भी दिल से !

    निय्यत-ए-शौक़ भर न जाए कहीं,तू भी दिल से उतर न जाए कहीं| नासिर काज़मी

  • 8th Dec 2025

    ठिकाने के दिन या!

    ‘फ़िराक़’ अपनी क़िस्मत में शायद नहीं थे,ठिकाने के दिन या ठिकाने की रातें| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 8th Dec 2025

    वो साक़ी से बातें!

    सर-ए-मय-कदा तिश्नगी की वो क़स्में,वो साक़ी से बातें बनाने की रातें| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 8th Dec 2025

    रतजगा के वो सामाँ!

    सर-ए-शाम से रतजगा के वो सामाँ,वो पिछले पहर नींद आने की रातें| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 8th Dec 2025

    मुस्कुराने की रातें!

    पुर-असरार सी मेरी अर्ज़-ए-तमन्ना,वो कुछ ज़ेर-ए-लब मुस्कुराने की रातें| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 8th Dec 2025

    हर सुब्ह-ए-रुख़्सत!

    मुझे याद है तेरी हर सुब्ह-ए-रुख़्सत,मुझे याद हैं तेरे आने की रातें| फ़िराक़ गोरखपुरी

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