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खेल ये बाज़ार का!
प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- खेल ये बाज़ार का, कुछ दिनबहुत अच्छा लगा! खूब बिके हम, खूब खरीदा, लोगों को, सामानों को, गोदामों में जमा कियासामानों को, परिधानों कोकिंतु जब होने लगा ये सच, हमें धक्का लगा। मिथ्या है ये जगत यही तो सुनते हम हैं आए चालें ऊपर…
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गधे ही गधे हैं!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं स्वर्गीय ओम प्रकाश आदित्य जी की एक प्रसिद्ध हास्य कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ- इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं जिधर देखता हूँ, गधे ही गधे हैं। आशा है आपको यह पसंद आएगी, धन्यवाद। *****
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ठिकाने के दिन या!
‘फ़िराक़’ अपनी क़िस्मत में शायद नहीं थे,ठिकाने के दिन या ठिकाने की रातें| फ़िराक़ गोरखपुरी
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मुस्कुराने की रातें!
पुर-असरार सी मेरी अर्ज़-ए-तमन्ना,वो कुछ ज़ेर-ए-लब मुस्कुराने की रातें| फ़िराक़ गोरखपुरी
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हर सुब्ह-ए-रुख़्सत!
मुझे याद है तेरी हर सुब्ह-ए-रुख़्सत,मुझे याद हैं तेरे आने की रातें| फ़िराक़ गोरखपुरी