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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 2nd Apr 2026

    एक मुद्दत से मिरी!

    एक मुद्दत से मिरी माँ नहीं सोई ‘ताबिश’,मैं ने इक बार कहा था मुझे डर लगता है| अब्बास ताबिश

  • 2nd Apr 2026

    दूर कटा कवि मैं जनता का !

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय केदारनाथ अग्रवाल जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदारनाथ अग्रवाल जी की यह कविता – दूर कटा कविमैं जनता का, कच-कच करताकचर रहा हूँ अपनी माटी;मिट-मिट करमैं सीख रहा हूँगतिपल जीने की परिपाटी…

  • 1st Apr 2026

    तस्दीक़ कराए जाकर!

    अपने शजरे* कि वो तस्दीक़ कराए जा कर,जिस को ज़ंजीर पहनते हुए डर लगता है|*वंश अब्बास ताबिश

  • 1st Apr 2026

    ओढ़ लेता हूँ तो सब!

    वक़्त लफ़्ज़ों से बनाई हुई चादर जैसा,ओढ़ लेता हूँ तो सब ख़्वाब हुनर लगता है| अब्बास ताबिश

  • 1st Apr 2026

    तुम तो कहते थे कि!

    मुझ से तो दिल भी मोहब्बत में नहीं ख़र्च हुआ,तुम तो कहते थे कि इस काम में घर लगता है| अब्बास ताबिश

  • 1st Apr 2026

    अब वो रस्ता भी मुझे!

    जिस पे चलते हुए सोचा था कि लौट आऊँगा,अब वो रस्ता भी मुझे शहर-बदर लगता है| अब्बास ताबिश

  • 1st Apr 2026

    कारवाँ गुज़र गया -7

    मेरे यूट्यूब चैनल के माध्यम से प्रस्तुत है मेरे स्वर में, नीरज जी के इस गीत का अगला भाग, जिसे फिल्म ‘नई उमर की नई फसल’ के लिए मोहम्मद रफी जी ने गाया था- कारवाँ गुज़र गया बहार देखते रहे -7 आशा है आपको यह पसंद आएगा, धन्यवाद। *******

  • 1st Apr 2026

    हम को दिल ने नहीं!

    हम को दिल ने नहीं हालात ने नज़दीक किया,धूप में दूर से हर शख़्स शजर लगता है| अब्बास ताबिश

  • 1st Apr 2026

    बीती ना बिताई रैना!

    अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में परिचय फिल्म का गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे गुलज़ार साहब ने लिखा था और राहुल देव बर्मन जी के संगीत निर्देशन में भूपेंद्र सिंह जी और लता मंगेशकर जी ने गाया था- बीती ना बिताई रैना, बिरहा की जाई रैना! आशा है आपको…

  • 1st Apr 2026

    चाँद दीवार पे रक्खा!

    रात को घर से निकलते हुए डर लगता है,चाँद दीवार पे रक्खा हुआ सर लगता है| अब्बास ताबिश

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