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पोंछ लेना मिरी !
पोंछ लेना मिरी पलकों से लहू की बूँदें,मिरी आँखों को अगर मंज़र-ए-सानी देना| क़ैसर शमीम
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रुतों की सर्द हवा!
आँखों की चमक मौहूम हुई लौ देते बदन अफ़्सुर्दा हुए,दर आई है ‘क़ैसर’ घर में मिरे ये कैसी रुतों की सर्द हवा| क़ैसर शमीम
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आई है घने जंगल में!
आई है घने जंगल में अभी जो खेल भी चाहे खेले मगर,कल मेरे साथ उड़ाएगी फिर सहरा सहरा गर्द हवा| क़ैसर शमीम
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क्या बात हुई क्यूँ!
क्या बात हुई क्यूँ शहर जला अब इस के सिवा कुछ याद नहीं,इक फ़र्द सरापा आग हुआ पल-भर में हुआ इक फ़र्द हवा| क़ैसर शमीम
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सुसाइड नोट!
अक्सर हमें आत्महत्याओं के समाचार मिलते रहते हैं, हाल ही में एक उच्च पुलिस अधिकारी द्वारा आत्महत्या का समाचार मिला था, उसी की प्रतिक्रिया स्वरूप एक गीत प्रस्तुत है। प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- कितना सहा दर्द जीवन मेंसाफ-साफ लिख गया! क्या मानें हम इस लेखन को कविता, गीत,…
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इक रोज़ उड़ा ले!
छूटे न कभी फूलों का नगर कोशिश तो यही है अपनी मगर,इक रोज़ उड़ा ले जाएगी पत्तों की तरह बे-दर्द हवा| क़ैसर शमीम
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कहाँ की गर्द हवा!
सब अपने शनासा छोड़ गए रस्ते में हमें ग़ैरों की तरह,चेहरे पे हमारे डाल गई ला कर ये कहाँ की गर्द हवा| क़ैसर शमीम
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मौसम तो बदलते हैं!
मौसम तो बदलते हैं लेकिन क्या गर्म हवा क्या सर्द हवा,ऐ दोस्त हमारे आँगन में रहती है हमेशा ज़र्द हवा| क़ैसर शमीम