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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 29th Nov 2018

    आज रात मैं लिख सकता हूँ

    आज भी मैं विख्यात कवि नोबेल पुरस्कार विजेता- श्री पाब्लो नेरुदा की जो मूलतः चिले से थे, की मूल रूप से ‘स्पेनिश’ भाषा में लिखी गई कविता, के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर उसका भावानुवाद और उसके बाद अंग्रेजी में अनूदित मूल कविता, जिसका मैंने अनुवाद किया है, उसको प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज…

  • 28th Nov 2018

    यदि तुम मुझे भूल जाओगी!

    आज से मैं विख्यात कवि, नोबेल पुरस्कार विजेता श्री पाब्लो नेरुदा जो मूलतः चिले से थे- की कुछ कविताओं का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। उनकी स्पेनिश में लिखी गई मूल कविता के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता…

  • 27th Nov 2018

    21. रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे!

    जीवन यात्रा का एक पड़ाव और, एक पुराना ब्लॉग! जयपुर में रहते हुए ही मैंने हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की एक वैकेंसी देखी, हिंदी अनुवादक के लिए, यह कार्यपालक श्रेणी का पद था, जबकि आकाशवाणी में, मैं पर्यवेक्षकीय स्तर पर था, हालांकि पदनाम वही था। इसके अलावा वेतन में काफी अंतर था। मैंने आवेदन किया और…

  • 26th Nov 2018

    Violence and Democracy!

    Our world has gone through many stages in history. Our country was considered to be the torch bearer of wisdom, a Guru for the world. We never tried to capture the land or the kingdom of others. While there were big democracies in the world, our country was divided into so many kingdoms lately and…

  • 25th Nov 2018

    WOW: What If I could travel the world like this!

    We keep living our lives in a formal atmosphere, most of the time discharging our duties- in office and at home. There is very little scope to dream, think of doing impossible looking things, even talking on such subjects lest people may not think that we have gone crazy! This time, the prompt on BlogAdda,…

  • 24th Nov 2018

    20. आंचल ही न समाए तो क्या कीजे!

    चलिए पुराने पन्ने पलटते हुए, एक क़दम और आगे बढ़ते हैं। आज फिर से जीवन का एक पुराना पृष्ठ, कुछ पुरानी यादें, एक पुराना ब्लॉग! जयपुर पहुंच गए लेकिन काफी कुछ पीछे छूट गया। मेरी मां, जिनके लिए हमारा वह पुराना मोहल्ला अपने गांव जैसा था, बल्कि मायका भी था क्योंकि उनके भतीजे- वकील साहब…

  • 23rd Nov 2018

    दीवार की मरम्मत!

    आज भी मैं विख्यात अंग्रेजी कवि श्री रॉबर्ट फ्रॉस्ट की एक कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद- दीवार की मरम्मत ऐसा कुछ है, जो दीवार को पसंद नहीं करता, वह, उसके नीचे जमी हुई जमीन को नीचे से फुला…

  • 22nd Nov 2018

    19. हम खें जुगनिया बनाय गए, अपुन जोगी हो गए राजा!

    आज फिर से प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग,जो मेरे लिए अविस्मरणीय है। दिल्ली में सरकारी सेवा के दौरान ही मैंने स्टाफ सेलेक्शन कमीशन की एक और परीक्षा दी, जो हिंदी अनुवादक के पद पर चयन के लिए थी। इस परीक्षा में मैं सफल हुआ और उसके आधार पर ही आकाशवाणी, जयपुर में अनुवादक पद…

  • 21st Nov 2018

    मैं पानी की कलाई हूँ!

    कविता के क्षेत्र में जो लोग मेरे लिए गुरुतुल्य रहे हैं, उनमें से एक हैं डॉ. कुंवर बेचैन जी। मैं एक छात्र के रूप में कुछ समय के लिए गाजियाबाद के एम.एम.एच. कालेज भी गया था, मैं तो विज्ञान का छात्र था, उस समय भी डॉ. कुंवर बेचैन जी उसी कालेज में पढ़ाते थे। उनकी…

  • 20th Nov 2018

    सर्दी की रात में सैर !

    आज भी मैं विख्यात अंग्रेजी कवि श्री रॉबर्ट फ्रॉस्ट की एक कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद- सर्दी की रात में सैर सर्दियों में शाम की सैर के लिए- कोई नहीं था मेरे साथ, जिससे कर सकूं कुछ बात,…

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