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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 9th May 2019

    न्यायाधीश- रवींद्रनाथ ठाकुर

                                   आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि  गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत…

  • 7th May 2019

    पहले दिन का सूरज- रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य…

  • 6th May 2019

    जंगल में दूर-दूर हवा का पता न था!

    आज ऐसे ही मन हुआ कि अभिव्यक्ति के इस मार्ग से जुड़ी एक गज़ल के बारे में बात कर लें, जिस पर मैं मानता हूँ कि मैं और मुझ जैसे बहुत सारे लोग चलते हैं। एक गज़ल याद आ रही है ज़नाब मुमताज़ राशिद जी की। वैसे तो यह किसी भी नये मार्ग पर चलने…

  • 5th May 2019

    Dream, Toil and Keep Happy for Success

    To succeed in life you need three things: a wishbone, a backbone and a funny bone – Reba Mc Entire – Can you relate to this quote? #ThreeBones Again it is time to express my views based on the above prompt on #IndiSpire. Yes this is a quote by Reba Mc Entire, which says that…

  • 4th May 2019

    58. वहाँ पैदल ही जाना है…..!

    आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- आज ऐसे ही, गीतकार शैलेंद्र जी की याद आ गई। मुझे ये बहुत मुश्किल लगता है कि किसी की जन्मतिथि अथवा पुण्यतिथि का इंतज़ार करूं और तब उसको याद करूं। मैंने कहीं पढ़ा था कि शैलेंद्र जी इप्टा से जुड़े…

  • 2nd May 2019

    मौसम ये भारतीय चुनावों का!

    बहुत दिनों से तत्कालीन परिवेश पर कोई आलेख नहीं लिखा है। जबकि आजकल दो स्पर्द्धाएं बड़े जोर-शोर से चल रही हैं। एक स्पर्धा में तो युवाओं की विशेष रुचि है, वह है- आईपीएल, जिसमें बहुत से देशों के खिलाड़ी भारत के किसी नगर, किसी क्षेत्र विशेष के नाम से जानी जाने वाली किसी एक टीम…

  • 29th Apr 2019

    मन की सीमारेखा!

    आज ‘रजनीगंधा’ फिल्म के संदर्भ के साथ, मुकेश जी का गाया एक बहुत प्यारा सा गीत याद आ रहा है। यह श्री अमोल पालेकर जी की शुरू कि फिल्मों में से एक थी, जिससे उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। फिल्म की नायिका थीं विद्या सिन्हा जी और अगर मुझे सही याद है तो…

  • 27th Apr 2019

    Pretentions – How far they affect us!

    Again it is time to write in reaction to a prompt on #IndiSpire. The prompt is- We are what we pretend to be, so we must be careful about what we pretend to be.” Kurt Vonnegut said that. Do you agree? I am sorry I do not think we can become what we pretend to…

  • 25th Apr 2019

    57. जब से गए हैं आप, किसी अजनबी के साथ!

    आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- आज एक बार फिर संगीत, विशेष रूप से गज़ल की दुनिया की बात कर लेते हैं। भारतीय उप महाद्वीप में जब गज़ल की बात चलती है तब अधिकतम स्पेस गुलाम अली जी और जगजीत सिंह जी घेर लेते हैं। हालांकि…

  • 24th Apr 2019

    सोई जानहि जेहि देऊ जनाई!

    एक और विषय, जो एक मंच पर ब्लॉग पोस्ट लिखने के लिए दिया गया था। उस विषय के बहाने यहाँ अपने विचार व्यक्त कर रहा हूँ, जिसे कह सकते हैं ‘नॉन पार्टिसिपेटिव एंट्री’। विषय था कोई ऐसा अनुभव जिसको आप तर्क के आधार पर नहीं समझा सकते! मेरे पास अपना ऐसा कोई अनुभव नहीं है…

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