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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 18th Jun 2019

    दोपहर का समय था तब – रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य…

  • 17th Jun 2019

    प्रेम पर कविता – रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य…

  • 16th Jun 2019

    जितने सूरज उगते देखे, उससे ज्यादा संग्राम रहे!

    आज हिंदी कविता, विशेष रूप से गीतों के एक अनूठे हस्ताक्षर- स्व. भारत भूषण जी का एक और गीत शेयर कर रहा हूँ। भारत भूषण जी मेरे प्रिय गीत कवि रहे हैं और अनेक बार उनको मंचों से कविता-पाठ करते सुनने का अवसर मिला है। कुछ बार उनके गीतों को सुनकर या पढ़कर आंखों में…

  • 15th Jun 2019

    An inspiring platform- Indiblogger

    I am not very old in the field of blogging. I had been writing poems long time back when I was in Delhi. Whenever I, or anybody else for that matter, wrote a new poem, it was a strong desire that the poem be recited in a poetic symposium, shared with some peers to know…

  • 14th Jun 2019

    जब मिलेगी रोशनी मुझसे मिलेगी!

    आज हिंदी गीतों के एक अत्यंत लोकप्रिय हस्ताक्षर रहे स्व. रामावतार त्यागी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। इस गीत में त्यागी जी ने एक जुझारू कलाकार के जज़्बे को अभिव्यक्ति दी है, जो यह हौसला रखता है कि वह अपने समर्पण और सृजनशीलता के बल पर दुनिया को रोशनी प्रदान करेगा। कवि…

  • 13th Jun 2019

    वो मौसम तो गुज़र गया!

    आज हिंदी गीतों के एक महान हस्ताक्षर स्व. गोपाल दास नीरज जी की याद आ रही है। हिंदी कविता और विशेष रूप से मंचीय गीत कवियों में अलग-अलग कवियों का जमाना रहा था। एक समय था जब मंचों पर बच्चन जी बहुत लोकप्रिय थे, उन्होंने अपनी जीवनी में भी यह प्रसंग लिखा है कि कैसे…

  • 12th Jun 2019

    आंधियों तुमने दरख्तों को गिराया होगा!

    आज कैफ भोपाली साहब की लिखी एक गज़ल याद आ रही है। वैसे तो गज़ल के सभी शेर स्वतंत्र होते हैं और वे अलग-अलग बात कह सकते हैं, लेकिन इस गज़ल में एक बात जो एक-दो शेरों में विशेष रूप से उभरकर आती है, वह है कि आस्था में बहुत बड़ी ताकत होती है। जहाँ…

  • 11th Jun 2019

    तेरी एक निगाह की बात है, मेरी ज़िंदगी का सवाल है!

    आज कुछ विचार आ रहे हैं दिमाग में और साथ ही एक पुराना गीत याद आ रहा है। हम सभी ईश्वर के सामने जाते हैं अपनी-अपनी फरियादें, कामनाएं लेकर और चाहते हैं कि वे पूरी हो जाएं। आजकल इंस्टेंट रिज़ल्ट की उम्मीद में लोग बाबाओं के पास भी बड़ी तादाद में जाते हैं और इस…

  • 10th Jun 2019

    अकेली जब जाती हूँ मैं रात्रि वेला में- रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य…

  • 9th Jun 2019

    ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को रुलाने के लिए आ!

    कल एक गज़ल शेयर की थी राज़ इलाहाबादी साहब की और ये बात की थी कि कैसे कवि-शायर लोग दुख में, गम में भी स्वाद ढूंढ लेते हैं। आज भी गज़ल के माध्यम से आंसुओं के स्वाद की बात करेंगे, ‘ इस उम्र से हूँ लज्ज्ज़्त-ए- गिरियां से भी महरूम, यानि बहुत दिनों से आंसुओं…

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