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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 4th Feb 2022

    शरमाये भी घबराये भी!

    एक पगली मेरा नाम जो ले शरमाये भी घबराये भी,गलियों गलियों मुझसे मिलने आये भी घबराये भी| मोहसिन नक़वी

  • 4th Feb 2022

    शीशे के झरोखों से सजाया न करो!

    शहर-ए-एहसास में पथराव बहुत है मोहसिन,दिल को शीशे के झरोखों से सजाया न करो| मोहसिन नक़वी

  • 4th Feb 2022

    प्यार के ज़ख्म अमानत हैं!

    ये जरूरी नहीं हर शख्स मसीहा ही हो,प्यार के ज़ख्म अमानत हैं दिखाया न करो| मोहसिन नक़वी

  • 4th Feb 2022

    राम की शक्ति पूजा

    एक बार फिर छायावाद युग में लौटते हैं और आज मैं उस युग के प्रमुख स्तंभ और हिन्दी कविता के गौरव स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की एक प्रमुख रचना ‘राम की शक्तिपूजा’ का प्रारंभिक और अंतिम भाग प्रस्तुत कर रहा हूँ| इस रचना में प्रसंग है कि श्रीराम जी का जब महाबली रावण से…

  • 3rd Feb 2022

    अफ़साना बना लेते हैं!

    लोग हर बात का अफ़साना बना लेते हैं,सबको हालात की रूदाद सुनाया न करो। मोहसिन नक़वी

  • 3rd Feb 2022

    प्यार छुपाया न करो!

    रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाया न करो,आँख सच बोलती है प्यार छुपाया न करो। मोहसिन नक़वी

  • 3rd Feb 2022

    कुछ पाना ज़रूरी है!

    मेरे होंटों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो, कि इसके बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है| वसीम बरेलवी

  • 3rd Feb 2022

    नज़र आना ज़रूरी है!

    सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का, जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है| वसीम बरेलवी

  • 3rd Feb 2022

    शर्माना ज़रूरी है!

    बहुत बेबाक आंखों में तअ’ल्लुक़ टिक नहीं पाता, मोहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है| वसीम बरेलवी

  • 3rd Feb 2022

    लचक जाना ज़रूरी है!

    थके-हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें, सलीक़ा-मंद शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है| वसीम बरेलवी

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