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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 8th Feb 2022

    कोई शख़्स मर गया यारो!

    वो कौन था वो कहाँ का था क्या हुआ था उसे,सुना है आज कोई शख़्स मर गया यारो| शहरयार

  • 8th Feb 2022

    दरिया उतर गया यारो!

    भटक रही थी जो कश्ती वो ग़र्क-ए-आब हुई,चढ़ा हुआ था जो दरिया उतर गया यारो| शहरयार

  • 8th Feb 2022

    नक़्श तमन्ना का हो गया धुंधला!

    हर एक नक़्श तमन्ना का हो गया धुंधला,हर एक ज़ख़्म मेरे दिल का भर गया यारो| शहरयार

  • 8th Feb 2022

    मैं अपने साये से–

    अजीब सानेहा मुझ पर गुज़र गया यारो,मैं अपने साये से कल रात डर गया यारो| शहरयार

  • 8th Feb 2022

    तन है केवल, प्राण कहाँ हैं !

    हमारी हिन्दी फिल्मों के लिए असंख्य लोकप्रिय गीत लिखने वाले, जनकवि शैलेन्द्र जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| शैलेन्द्र जी ने जो कुछ भी लिखा उसमें उनकी अलग छाप दिखाई देती है| आज की इस कविता में भी कुछ ऐसे गहन भाव हैं जो अभिव्यक्त करते हैं कि जीवन में अभाव कैसे-कैसे…

  • 7th Feb 2022

    सब आसार खलल के हैं!

    क्या दिमाग़ का हाल कहें, सब आसार खलल के हैं। बालस्वरूप राही

  • 7th Feb 2022

    रेत भरी है आंखों में!

    रेत भरी है आंखों में,सपने ताजमहल के हैं। बालस्वरूप राही

  • 7th Feb 2022

    मिसरे उसी ग़ज़ल के हैं!

    जो आधे में छूटी हम,मिसरे उसी ग़ज़ल के हैं। बिछे पाँव में क़िस्मत है,टुकड़े तो मखमल के हैं। बालस्वरूप राही

  • 7th Feb 2022

    ठेकेदार धुंधलके हैं!

    नई सुबह के क्या कहने,ठेकेदार धुंधलके हैं। बालस्वरूप राही

  • 7th Feb 2022

    सौदे गंगा जल के हैं!

    मदिरालय की मेज़ों पर,सौदे गंगा जल के हैं। बालस्वरूप राही

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