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नई तहज़ीब के झगड़े!
पुरानी काविशें दैर-ओ-हरम की मिटती जाती है,नई तहज़ीब के झगड़े हैं अब शैख़-ओ-बरहमन में| चकबस्त बृज नारायण
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अँधेरी रात में मोती!
नहीं होता है मुहताज-ए-नुमाइश फ़ैज़ शबनम का,अँधेरी रात में मोती लुटा जाती है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण
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सहर होती गुलशन में!
शबाब आया है पैदा रंग है रुख़्सार-ए-नाज़ुक से,फ़रोग़-ए-हुस्न कहता है सहर होती है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण
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मेरा यूट्यूब चैनल
मैं अपने सभी साथियों को बताना चाहूंगा कि मैं अपने यूट्यूब चैनल में अपने स्वर में अपनी तथा अनेक श्रेष्ठ कवियों की रचनाएं शेयर करता रहता हूँ।यूट्यूब की अपनी पोस्ट मैं यहाँ भी शेयर करता हूँ लेकिन बेहतर होगा यदि कविता और पुराने फिल्मी गीतों में रुचि रखने वाले साथी मेरे यूट्यूब चैनल को भी…
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सही गलत रिश्तों में बंधे हुए हम!
आज फिर से मैं अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से एक सुंदर गीत शेयर कर रहा हूँ जो मेरे अग्रज श्री कुबेर दत्त जी ने लिखा था। कुबेर जी ने बाद में बाद में दूरदर्शन के लिए प्रोड्यूस किए गए अपने कार्यक्रमों के माध्यम से भी बहुत नाम कमाया था। कुबेर दत्त जी द्वारा लिखे…
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शराब-ए-हुस्न को!
शराब-ए-हुस्न को कुछ और ही तासीर देता है,जवानी के नुमू से बे-ख़बर होना लड़कपन में| चकबस्त बृज नारायण
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सैकड़ों मोती हैं!
ज़माना में नहीं अहल-ए-हुनर का क़द्र-दाँ बाक़ी,नहीं तो सैकड़ों मोती हैं इस दरिया के दामन में| चकबस्त बृज नारायण
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दीपावली की रात!
प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- रोशनी से धुल गई सारी सियाहीअमावस की इस अंधेरी रात की। चांद बेशक है नहीं, पर छा रहाउल्लसित पावन उजाला, हर तरफहै हमारी आस्था का प्रतिफलन चांदनी का सिलसिला चारों तरफ अमर स्मृतियां हैं हमारे साथ मेंसत्य की जय की, असत की मात की। रात…
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क़फ़स में कह गया!
हवा-ए-ताज़ा दिल को ख़ुद-बख़ुद बेचैन करती है, क़फ़स में कह गया कोई बहार आई है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण