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शिद्दतें जुदाई की!
इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की,आज पहली बार उस से मैं ने बेवफ़ाई की| अहमद फ़राज़
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मैं आज ज़द पे अगर!
मैं आज ज़द पे अगर हूँ तो ख़ुश-गुमान न हो,चराग़ सब के बुझेंगे हवा किसी की नहीं| अहमद फ़राज़
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निगाह-ए-यार मगर!
सब अपने अपने फ़साने सुनाते जाते हैं,निगाह-ए-यार मगर हम-नवा किसी की नहीं| अहमद फ़राज़
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ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था!
आज एक बार फिर मैं अपने यूटयूब चैनल के माध्यम से अपने स्वर में मुकेश जी की गाई हुई एक गैर फिल्मी ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ जिसके शायर है जान निसार अख्तर जी, बोल हैं- ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था, दिल ए तबाह ने भी क्या मिजाज़ पाया था लीजिए…
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ख़िज़ाँ में चाक-गरेबाँ !
ख़िज़ाँ में चाक-गरेबाँ था मैं बहार में तू,मगर ये फ़स्ल-ए-सितम-आश्ना किसी की नहीं| अहमद फ़राज़
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सदा किसी की नहीं!
ये शहर सेहर-ज़दा* है सदा किसी की नहीं,यहाँ ख़ुद अपने लिए भी दुआ किसी की नहीं| *खौफनाक अहमद फ़राज़
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बुत से दोस्ताना किया!
वो हीला-गर जो वफ़ा-जू भी है जफ़ा-ख़ू भी,किया भी ‘फ़ैज़’ तो किस बुत से दोस्ताना किया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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कब जाओगे बादल!
आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- वापस कब जाओगे बादलरस्ता भूल गए। जहाँ ज़रूरत नहीं रही अबअटके हो ग़ोवा मेंबुला रही रजधानी उलझी हैविष भरी हवा में, कैसे लानी है मौसम मेंसमता भूल गए। कुछ तो अनुशासन सीखो तुमबादल मेरे भाई,कहीं बरसते बे मौसम परकहीं बूंद न आई यूं…
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सहा तो क्या न सहा!
थे ख़ाक-ए-राह भी हम लोग क़हर-ए-तूफ़ाँ भी,सहा तो क्या न सहा और किया तो क्या न किया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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सुलूक जिससे किया!
ग़म-ए-जहाँ हो रुख़-ए-यार हो कि दस्त-ए-अदू,सुलूक जिस से किया हम ने आशिक़ाना किया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़