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पिंजरा बदलता है!
रिहाई मिल तो जाती है परिंदे को मगर इतनी,सफ़ाई की ग़रज़ से जब कभी पिंजरा बदलता है| वसीम नादिर
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जनाज़ा अपनी मर्ज़ी!
तुम्हारे बाद अब जिस का भी जी चाहे मुझे रख ले,जनाज़ा अपनी मर्ज़ी से कहाँ कांधा बदलता है| वसीम नादिर
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मगर इन कोशिशों से!
कभी कपड़े बदलता है कभी लहजा बदलता है,मगर इन कोशिशों से क्या कहीं शजरा* बदलता है|*वंशावली वसीम नादिर
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फिर ख़बर रिहाई की!
फिर क़फ़स में शोर उट्ठा क़ैदियों का और सय्याद,देखना उड़ा देगा फिर ख़बर रिहाई की| अहमद फ़राज़
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अश्कों में जो पाया है!
आज एक बार मैं अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से अपने स्वर में एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ। इस गीत को साहिर लुधियानवी साहब ने लिखा था और तलत महमूद जी ने इसे गाया है। प्रस्तुत है यह गीत- आशा है आपको यह गीत पसंद आएगा।
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हमने क्या बुराई की!
तंज़ ओ ता’ना ओ तोहमत सब हुनर हैं नासेह के, आप से कोई पूछे हम ने क्या बुराई की| अहमद फ़राज़
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खुद से कर लें बात!
आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- पढ़ने वाला भले न कोईप्रेरित हुए भवानी जी सेलिखते रहते हम दिन-रात। पढ़कर सम्मति दे यदि कोईक्या तब अर्थ बदल जाएंगे व्यस्त सभी अपने कर्मों मेंहमको पढ़ने क्यों आएंगे, ये दुनिया तो है अपनी भीकविता में कह लेंगे हम भी निज सुख-दुख, जज़्बात।…
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कौन अब ख़बर लावे!
तर्क कर चुके क़ासिद कू-ए-ना-मुरादाँ को, कौन अब ख़बर लावे शहर-ए-आश्नाई की| अहमद फ़राज़
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आज उनसे मजबूरन!
तज दिया था कल जिन को हम ने तेरी चाहत में,आज उन से मजबूरन ताज़ा आश्नाई की| अहमद फ़राज़
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या तो टूट कर रोया!
वर्ना अब तलक यूँ था ख़्वाहिशों की बारिश में,या तो टूट कर रोया या ग़ज़ल-सराई की| अहमद फ़राज़