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अपनी ही लाश का ख़ुद मज़ार आदमी!
सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ,अपनी ही लाश का ख़ुद मज़ार आदमी| निदा फ़ाज़ली
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रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला!
एक जमाने में कवि सम्मेलनों में अपने गीतों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देने वाले स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी को आज याद करते हैं उनकी सबसे अधिक प्रसिद्ध कृति ‘मधुशाला’ के कुछ छंदों के माध्यम से, यह रचना उन्होंने उम्र खैयाम की रूबाइयों के आधार पर लिखी थी| यह रचना अपने आप में ही…
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हमें भी नींद आ जायेगी हम भी सो ही जायेंगे!
हमें भी नींद आ जायेगी हम भी सो ही जायेंगे,अभी कुछ बेक़रारी है सितारों तुम तो सो जाओ| क़तील शिफ़ाई
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यही क़िस्मत हमारी है सितारों तुम तो सो जाओ!
हमें तो आज की शब पौ फटे तक जागना होगा,यही क़िस्मत हमारी है सितारों तुम तो सो जाओ| क़तील शिफ़ाई
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कहे जाते हो रो-रो के हमारा हाल दुनिया से!
कहे जाते हो रो-रो के हमारा हाल दुनिया से,ये कैसी राज़दारी है सितारों तुम तो सो जाओ| क़तील शिफ़ाई
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ये बाज़ी हमने हारी है सितारों तुम तो सो जाओ!
तुम्हें क्या आज भी कोई अगर मिलने नहीं आया,ये बाज़ी हमने हारी है सितारों तुम तो सो जाओ| क़तील शिफ़ाई
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हमें ये रात भारी है सितारों तुम तो सो जाओ!
हँसो और हँसते-हँसते डूबते जाओ ख़लाओं में,हमें ये रात भारी है सितारों तुम तो सो जाओ| क़तील शिफ़ाई
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सितारों तुम तो सो जाओ!
परेशां रात सारी है सितारों तुम तो सो जाओ,सुकूत-ए-मर्ग तारी है सितारों तुम तो सो जाओ| क़तील शिफ़ाई