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तो अभी से छोड़ जाओ!
मेरे हमसफ़र पुराने मेरे अब भी मुंतज़िर हैं,तुम्हें साथ छोड़ना है तो अभी से छोड़ जाओ| अहमद फ़राज़
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उन्हें तुम भी क्यूँ सुनाओ!
वो कहानियाँ अधूरी, जो न हो सकेंगी पूरी,उन्हें मैं भी क्यूँ सुनाऊँ, उन्हें तुम भी क्यूँ सुनाओ| अहमद फ़राज़
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किसी दर्द को जगाओ!
ये उदासियों के मौसम कहीं रायेगाँ न जाएं,किसी ज़ख़्म को कुरेदो, किसी दर्द को जगाओ| अहमद फ़राज़
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कहीं जाँ से भी न जाओ!
इन्हीं ख़ुशगुमानियों में कहीं जां से भी न जाओ,वो जो चारागर नहीं है उसे ज़ख़्म क्यूं दिखाओ| अहमद फ़राज़
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तुम हो पहरेदार चमन के!
श्री उदय प्रताप सिंह जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| उदय प्रताप जी सांसद रहे हैं और जैसी मुझे जानकारी रही है, वे मुलायम सिंह जी के गुरू रहे हैं| मूल रूप से उदय प्रताप जी कवि हैं, सांसद भी बने लेकिन वे राजनैतिक व्यक्ति नहीं हैं| जहां तक मुझे याद है…
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शौक से अपनी नज़र के—
हम तुम्हारे सामने हैं, फिर तुम्हें डर काहे का,शौक से अपनी नज़र के वार कर दो यार तुम|