-
याद भी आते नहीं!
क्या क़यामत है ‘मुनीर’ अब याद भी आते नहीं,वो पुराने आश्ना जिन से हमें उल्फ़त भी थी| मुनीर नियाज़ी
-
अजनबी शहरों में!
अजनबी शहरों में रहते उम्र सारी कट गई,गो ज़रा से फ़ासले पर घर की हर राहत भी थी| मुनीर नियाज़ी
-
कुछ मिरी हिम्मत भी!
कह गया मैं सामने उस के जो दिल का मुद्दआ’,कुछ तो मौसम भी अजब था कुछ मिरी हिम्मत भी थी| मुनीर नियाज़ी
-
जो हवा में घर बनाए!
जो हवा में घर बनाए काश कोई देखता,दश्त में रहते थे पर ता’मीर की आदत भी थी| मुनीर नियाज़ी
-
चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले!
आपकी सेवा में अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज एक बार फिर मैं एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे लिखा था ज़नाब अमजद इस्लाम अमजद जी ने और गाया था जगजीत सिंह जी ने, इसके बोल हैं – चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले!लीजिए प्रस्तुत है ये ग़ज़ल धन्यवाद
-
फूल थे बादल भी था!
फूल थे बादल भी था और वो हसीं सूरत भी थी,दिल में लेकिन और ही इक शक्ल की हसरत भी थी| मुनीर नियाज़ी
-
मौसम की बात करेंगे!
प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- विषय आज कुछ नहीं सूझताफिर मौसम की बात करेंगे। मौसम के हम नहीं नियंताअक्सर उसके मारे रहतेकभी किसी हद तक भाता वहकभी प्रभाव दुधारे रहते, लेकिन उसके बारे में हमकुछ तो तहकीकात करेंगे। वैसे यह भी नहीं रहा अबऊपर वाले की मर्जी भरकुछ माहौल बना…
-
उस आख़िरी नज़र में !
उस आख़िरी नज़र में अजब दर्द था ‘मुनीर’,जाने का उस के रंज मुझे उम्र भर रहा| मुनीर नियाज़ी
-
दूरी का ये तिलिस्म!
गुज़री है क्या मज़े से ख़यालों में ज़िंदगी,दूरी का ये तिलिस्म बड़ा कारगर रहा| मुनीर नियाज़ी