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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 14th Jan 2022

    इक पीर पली मीलों तक!

    आज एक बार फिर मैं, मेरे लिए गुरु तुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| डॉक्टर कुँवर बेचैन जी अत्यंत सरल हृदय व्यक्ति और श्रेष्ठ रचनाकार थे| उनसे मिलने और उनका कविता पाठ सुनने का अनुभव स्मरणीय होता था| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की…

  • 13th Jan 2022

    किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं!

    धन के हाथों बिके हैं सब क़ानूनअब किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं। कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 13th Jan 2022

    कोई अता-पता ही नहीं!

    जिसके कारण फ़साद होते हैंउसका कोई अता-पता ही नहीं। कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 13th Jan 2022

    कोई इन्तहा ही नहीं!

    सच घटे या बढ़े तो सच न रहे,झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं। कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 13th Jan 2022

    दूसरा कोई रास्ता ही नहीं!

    ज़िन्दगी! मौत तेरी मंज़िल हैदूसरा कोई रास्ता ही नहीं। कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 13th Jan 2022

    कुछ बचा ही नहीं!

    इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं,मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं| कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 13th Jan 2022

    क्या जुर्म है पता ही नहीं!

    ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं,और क्या जुर्म है पता ही नहीं। कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 13th Jan 2022

    नाम-धाम से काम का क्या है सामंजस्य?

    आज एक बार फिर से हिन्दी काव्य मंचों पर किसी समय हास्य कविताओं का पर्याय बने रहे स्वर्गीय काका हाथरसी जी की एक प्रसिद्ध कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में एक सौ आठ नामों के माध्यम से बताया गया है कि किसी व्यक्ति के नाम और उसके काम में तालमेल होना अक्सर संयोग…

  • 12th Jan 2022

    जाने कहाँ रात की!

    सितारों को शायद ख़बर ही नहीं,मुसाफ़िर ने जाने कहाँ रात की| बशीर बद्र

  • 12th Jan 2022

    मैं चुप था तो–

    मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई,ज़ुबां सब समझते हैं जज़्बात की| बशीर बद्र

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