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इक पीर पली मीलों तक!
आज एक बार फिर मैं, मेरे लिए गुरु तुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| डॉक्टर कुँवर बेचैन जी अत्यंत सरल हृदय व्यक्ति और श्रेष्ठ रचनाकार थे| उनसे मिलने और उनका कविता पाठ सुनने का अनुभव स्मरणीय होता था| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की…
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किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं!
धन के हाथों बिके हैं सब क़ानूनअब किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं। कृष्ण बिहारी ‘नूर’
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कुछ बचा ही नहीं!
इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं,मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
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क्या जुर्म है पता ही नहीं!
ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं,और क्या जुर्म है पता ही नहीं। कृष्ण बिहारी ‘नूर’
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नाम-धाम से काम का क्या है सामंजस्य?
आज एक बार फिर से हिन्दी काव्य मंचों पर किसी समय हास्य कविताओं का पर्याय बने रहे स्वर्गीय काका हाथरसी जी की एक प्रसिद्ध कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में एक सौ आठ नामों के माध्यम से बताया गया है कि किसी व्यक्ति के नाम और उसके काम में तालमेल होना अक्सर संयोग…