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तुमसे अलग होकर!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि और समाचार पत्रिका दिनमान के संपादन से संबंधित रहे स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। सर्वेश्वर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता – तुमसे अलग होकर लगता…
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हर फूल अपनी शाख़!
गुलशन में इस तरह से कब आई थी फ़स्ल-ए-गुल,हर फूल अपनी शाख़ से टूटा हुआ सा है| शहरयार
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हमारी बे-हिसी पे!
हमारी बे-हिसी पे रोने वाला भी नहीं कोई,चलो जल्दी चलो फिर शहर को जलता हुआ देखें| शहरयार
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ये चाहा था कि मंज़र !
धुएँ के बादलों में छुप गए उजले मकाँ सारे,ये चाहा था कि मंज़र शहर का बदला हुआ देखें| शहरयार
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सुकूत-ए-शाम से!
सुकूत-ए-शाम* से पहले की मंज़िल सख़्त होती है,कहो लोगों से सूरज को न यूँ ढलता हुआ देखें|*Silence of Evening शहरयार
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पिन बहुत सारे!
एक बार फिर सेअपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में स्वर्गीय डॉक्टर कुंवर बेचैन जी का एक सुंदर गीत आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ, गीत के बोल हैं- ज़िंदगी का अर्थ मरना हो गया है, और जीने के लिए हैं दिन बहुत सारे! आशा है आपको पसंद आएगा,धन्यवाद्।
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अन-देखा हुआ देखें!
बहुत मुद्दत हुई ये आरज़ू करते हुए हम को,कभी मंज़र कहीं हम कोई अन-देखा हुआ देखें| शहरयार
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भरी दुपहरी!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि, नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – भरी दुपहरीमारी-मारी फिरे डाल परपतछाँही के लिए गिलहरीभरी दुपहरी । उलटी धूपघड़ी की टिड्डीचाट…