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दूसरे घर के हम हैं!
पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है,अपने ही घर में, किसी दूसरे घर के हम हैं | निदा फ़ाज़ली
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उधर के हम हैं!
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं,रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं | निदा फ़ाज़ली
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चला गया मटरू!
बहुत लंबा समय नहीं हुआ है, शायद सात-आठ माह हुए हों, मैंने अपनी ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से अपने घर की बॉलकनी में आकर एक मेहमान के स्थापित होने की सूचना दी थी| उसी समय गोवा में तूफान आया था, शायद उससे भी इस मेहमान के आने का संबंध हो, यह एक श्वेत कपोत था,…
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क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है!
एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है,जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं| दुष्यंत कुमार
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फूल कुम्हलाने लगे हैं!
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,ये कमाल के फूल कुम्हलाने लगे हैं| दुष्यंत कुमार