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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 25th Jan 2022

    दूसरे घर के हम हैं!

    पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है,अपने ही घर में, किसी दूसरे घर के हम हैं | निदा फ़ाज़ली

  • 25th Jan 2022

    उधर के हम हैं!

    अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं,रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं | निदा फ़ाज़ली

  • 25th Jan 2022

    चला गया मटरू!

    बहुत लंबा समय नहीं हुआ है, शायद सात-आठ माह हुए हों, मैंने अपनी ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से अपने घर की बॉलकनी में आकर एक मेहमान के स्थापित होने की सूचना दी थी| उसी समय गोवा में तूफान आया था, शायद उससे भी इस मेहमान के आने का संबंध हो, यह एक श्वेत कपोत था,…

  • 24th Jan 2022

    नई तहज़ीब के पेशे-नज़र हम!

    अब नई तहज़ीब के पेशे-नज़र हम,आदमी को भून कर खाने लगे हैं| दुष्यंत कुमार

  • 24th Jan 2022

    दोहराने लगे हैं!

    मौलवी से डाँट खा कर अहले-मक़तब,फिर उसी आयत को दोहराने लगे हैं| दुष्यंत कुमार

  • 24th Jan 2022

    क़तराने लगे हैं!

    मछलियों में खलबली है अब सफ़ीने,उस तरफ़ जाने से क़तराने लगे हैं| दुष्यंत कुमार

  • 24th Jan 2022

    क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है!

    एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है,जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं| दुष्यंत कुमार

  • 24th Jan 2022

    समझाने लगे हैं!

    वो सलीबों के क़रीब आए तो हमको,क़ायदे-क़ानून समझाने लगे हैं| दुष्यंत कुमार

  • 24th Jan 2022

    फूल कुम्हलाने लगे हैं!

    अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,ये कमाल के फूल कुम्हलाने लगे हैं| दुष्यंत कुमार

  • 24th Jan 2022

    लोग चिल्लाने लगे हैं!

    कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं,गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं| दुष्यंत कुमार

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