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ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते!
चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी, वगर्ना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते| क़तील शिफ़ाई
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वो अफ़्साने कहाँ जाते!
तुम्हारी अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ जाते, जो वाबस्ता हुए तुमसे वो अफ़्साने कहाँ जाते| क़तील शिफ़ाई
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मधुशाला भाग-3
आज फिर से मैं आधुनिक हिन्दी गीत के प्रमुख हस्ताक्षर रहे, श्री अमिताभ बच्चन जी के पूज्य पिताश्री और काव्य-मंचों पर अपने गीतों से धूम मचाने वाले प्रातः स्मरणीय हरिवंश राय बच्चन जी की कविताओं को शेयर करने के क्रम में उनकी प्रसिद्ध कृति ‘मधुशाला’ का एक और अंश शेयर कर रहा हूँ| लीजिए आज…
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चालें बदल के देखते हैं!
न तुझको मात हुई है न मुझको मात हुई, सो अब के दोनों ही चालें बदल के देखते हैं| अहमद फ़राज़
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क़ालिब में ढल के देखते हैं!
ये क़ुर्ब* क्या है कि यक-जाँ हुए न दूर रहे, हज़ार एक ही क़ालिब** में ढल के देखते हैं |*Nearness, **Body अहमद फ़राज़
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तुझे मुझको जल के देखते हैं!
ये कौन लोग हैं मौजूद तेरी महफ़िल में, जो लालचों से तुझे मुझको जल के देखते हैं| अहमद फ़राज़
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आँखों को मल के देखते हैं!
तू सामने है तो फिर क्यूँ यक़ीं नहीं आता, ये बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं| अहमद फ़राज़
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आगे निकल के देखते हैं!
रह-ए-वफ़ा में हरीफ़-ए-ख़िराम कोई तो हो, सो आज अपने आप से आगे निकल के देखते हैं| अहमद फ़राज़