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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 22nd Aug 2022

    ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते!

    चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी, वगर्ना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते| क़तील शिफ़ाई

  • 22nd Aug 2022

    तो पैमाने कहाँ जाते!

    तुम्हारी बे-रुख़ी ने लाज रख ली बादा-ख़ाने की, तुम आँखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते| क़तील शिफ़ाई

  • 22nd Aug 2022

    ख़ुदा जाने कहाँ जाते!

    निकलकर दैर-ओ-काबा से अगर मिलता न मय-ख़ाना, तो ठुकराए हुए इंसाँ ख़ुदा जाने कहाँ जाते| क़तील शिफ़ाई

  • 22nd Aug 2022

    वो अफ़्साने कहाँ जाते!

    तुम्हारी अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ जाते, जो वाबस्ता हुए तुमसे वो अफ़्साने कहाँ जाते| क़तील शिफ़ाई

  • 22nd Aug 2022

    मधुशाला भाग-3

    आज फिर से मैं आधुनिक हिन्दी गीत के प्रमुख हस्ताक्षर रहे, श्री अमिताभ बच्चन जी के पूज्य पिताश्री और काव्य-मंचों पर अपने गीतों से धूम मचाने वाले प्रातः स्मरणीय हरिवंश राय बच्चन जी की कविताओं को शेयर करने के क्रम में उनकी प्रसिद्ध कृति ‘मधुशाला’ का एक और अंश शेयर कर रहा हूँ| लीजिए आज…

  • 21st Aug 2022

    चालें बदल के देखते हैं!

    न तुझको मात हुई है न मुझको मात हुई, सो अब के दोनों ही चालें बदल के देखते हैं| अहमद फ़राज़

  • 21st Aug 2022

    क़ालिब में ढल के देखते हैं!

    ये क़ुर्ब* क्या है कि यक-जाँ हुए न दूर रहे, हज़ार एक ही क़ालिब** में ढल के देखते हैं |*Nearness, **Body अहमद फ़राज़

  • 21st Aug 2022

    तुझे मुझको जल के देखते हैं!

    ये कौन लोग हैं मौजूद तेरी महफ़िल में, जो लालचों से तुझे मुझको जल के देखते हैं| अहमद फ़राज़

  • 21st Aug 2022

    आँखों को मल के देखते हैं!

    तू सामने है तो फिर क्यूँ यक़ीं नहीं आता, ये बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं| अहमद फ़राज़

  • 21st Aug 2022

    आगे निकल के देखते हैं!

    रह-ए-वफ़ा में हरीफ़-ए-ख़िराम कोई तो हो, सो आज अपने आप से आगे निकल के देखते हैं| अहमद फ़राज़

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