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बिल्डिंगें बांहों की सूरत!
नगर की बिल्डिंगें बांहों की सूरत,बशर टूटी हुई अंगड़ाइयां हैं| सूर्यभानु गुप्त
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हिमगिरि विशाल, गिरिवर विशाल!
एक बार फिर से मैं आज राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत, राष्ट्र वंदना की रचनाएं लिखने वाले स्वर्गीय सोहनलाल द्विवेदी जी की एक राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत कविता शेयर कर रहा हूँ| उनकी गांधी जी के लिए लिखी गई कविता- ‘चल पड़े जिधर दो डग मग में’ बहुत प्रसिद्ध हुई और राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम हेतु उन्होंने अपनी…
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हक़ीक़त पर्वतों की राइयां हैं!
बिके पानी समन्दर के किनारे,हक़ीक़त पर्वतों की राइयां हैं| सूर्यभानु गुप्त
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अपनी ही ख़ुद परछाइयाँ हैं!
है ऐसी तेज़ रफ़्तारी का आलम,कि लोग अपनी ही ख़ुद परछाइयाँ हैं| सूर्यभानु गुप्त
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यहां भी है वहां भी!
आज एक बार फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय शायर ज़नाब निदा फ़ाज़ली साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| इस ग़ज़ल में वास्तव में उन्होंने भारत और पाकिस्तान के संदर्भ में अपनी बात कही है और बताया है कि धार्मिक उन्माद में बहने वाले लोग इधर भी हैं और उधर भी| जो सज्जन…