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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 27th Feb 2022

    थीं सजी हसरतें दूकानों पर!

    थीं सजी हसरतें दूकानों पर,ज़िन्दगी के अजीब मेले थे| जावेद अख़्तर

  • 27th Feb 2022

    आँसुओं के रेले थे!

    इक तरफ़ मोर्चे थे पलकों के,इक तरफ़ आँसुओं के रेले थे| जावेद अख़्तर

  • 27th Feb 2022

    दिल की गली में खेले थे!

    हम तो बचपन में भी अकेले थे,सिर्फ़ दिल की गली में खेले थे| जावेद अख़्तर

  • 27th Feb 2022

    लेकिन मेरा लावारिस दिल!

    आज मैं स्वर्गीय राही मासूम रज़ा साहब की एक नज़्म शेयर कर रहा हूँ| राही मासूम रज़ा साहब एक प्रतिष्ठित साहित्यकार थे तथा उनको अनेक साहित्यिक सम्मानों के अलावा पद्मश्री और पद्मभूषण जैसे अलंकरणों से भी सम्मानित किया गया था| उनके उपन्यास ‘दिल एक सादा कागज’, ‘आधा गांव’ आदि को पढ़ते हुए भी कभी कभी…

  • 26th Feb 2022

    इन्सान कहाँ तक पहुंचे!

    चांद को छूके चले आए हैं विज्ञान के पंख,देखना ये है कि इन्सान कहाँ तक पहुंचे। गोपालदास “नीरज”

  • 26th Feb 2022

    मेरी आवाज़ वहां तक पहुंचे!

    एक इस आस पे अब तक है मेरी बन्द जुबां,कल को शायद मेरी आवाज़ वहां तक पहुंचे। गोपालदास “नीरज”

  • 26th Feb 2022

    जो तेरे मकाँ तक पहुंचे!

    वो न ज्ञानी ,न वो ध्यानी, न बिरहमन, न वो शेख,वो कोई और थे जो तेरे मकाँ तक पहुंचे। गोपालदास “नीरज”

  • 26th Feb 2022

    ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुंचे!

    इतना मालूम है, ख़ामोश है सारी महफ़िल,पर न मालूम, ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुंचे । गोपालदास “नीरज”

  • 26th Feb 2022

    ऐ यार ! वहाँ तक पहुंचे!

    हम तेरी चाह में, ऐ यार ! वहाँ तक पहुंचे।होश ये भी न जहाँ है कि कहाँ तक पहुंचे। गोपालदास “नीरज”

  • 26th Feb 2022

    जो अगर-मगर में रहा!

    हज़ारों रत्न थे उस जौहरी की झोली में,उसे न कुछ भी मिला जो अगर-मगर में रहा । गोपालदास “नीरज”

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