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लेकिन मेरा लावारिस दिल!
आज मैं स्वर्गीय राही मासूम रज़ा साहब की एक नज़्म शेयर कर रहा हूँ| राही मासूम रज़ा साहब एक प्रतिष्ठित साहित्यकार थे तथा उनको अनेक साहित्यिक सम्मानों के अलावा पद्मश्री और पद्मभूषण जैसे अलंकरणों से भी सम्मानित किया गया था| उनके उपन्यास ‘दिल एक सादा कागज’, ‘आधा गांव’ आदि को पढ़ते हुए भी कभी कभी…
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इन्सान कहाँ तक पहुंचे!
चांद को छूके चले आए हैं विज्ञान के पंख,देखना ये है कि इन्सान कहाँ तक पहुंचे। गोपालदास “नीरज”
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मेरी आवाज़ वहां तक पहुंचे!
एक इस आस पे अब तक है मेरी बन्द जुबां,कल को शायद मेरी आवाज़ वहां तक पहुंचे। गोपालदास “नीरज”
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जो तेरे मकाँ तक पहुंचे!
वो न ज्ञानी ,न वो ध्यानी, न बिरहमन, न वो शेख,वो कोई और थे जो तेरे मकाँ तक पहुंचे। गोपालदास “नीरज”
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ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुंचे!
इतना मालूम है, ख़ामोश है सारी महफ़िल,पर न मालूम, ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुंचे । गोपालदास “नीरज”
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ऐ यार ! वहाँ तक पहुंचे!
हम तेरी चाह में, ऐ यार ! वहाँ तक पहुंचे।होश ये भी न जहाँ है कि कहाँ तक पहुंचे। गोपालदास “नीरज”
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जो अगर-मगर में रहा!
हज़ारों रत्न थे उस जौहरी की झोली में,उसे न कुछ भी मिला जो अगर-मगर में रहा । गोपालदास “नीरज”