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अब तो ये बातें भी!
उनका ग़म उनका तसव्वुर उनके शिकवे अब कहाँ,अब तो ये बातें भी ऐ दिल हो गईं आई गई| साहिर लुधियानवी
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दिल की धड़कन में!
दिल की धड़कन में तवाज़ुन* आ चला है ख़ैर हो,मेरी नज़रें बुझ गईं या तेरी रानाई गई|*विराम साहिर लुधियानवी
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सूरज की पेशी!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय कन्हैया लाल नंदन जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। नंदन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैया लाल नंदन जी का यह नवगीत – आँखों में रंगीन नज़ारेसपने बड़े-बड़ेभरी धार लगता है जैसेबालू बीच खड़े । बहके…
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कैसे कैसे पैकरों की!
कैसे कैसे चश्म ओ आरिज़ गर्द-ए-ग़म से बुझ गए,कैसे कैसे पैकरों की शान-ए-ज़ेबाई गई| साहिर लुधियानवी
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हम करें तर्क-ए-वफ़ा!
हम करें तर्क-ए-वफ़ा अच्छा चलो यूँ ही सही,और अगर तर्क-ए-वफ़ा से भी न रुस्वाई गई| साहिर लुधियानवी
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ऐ ग़म-ए-दुनिया !
ऐ ग़म-ए-दुनिया तुझे क्या इल्म तेरे वास्ते,किन बहानों से तबीअ’त राह पर लाई गई| साहिर लुधियानवी
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बिक गए जब तेरे लब!
बिक गए जब तेरे लब फिर तुझ को क्या शिकवा अगर,ज़िंदगानी बादा ओ साग़र से बहलाई गई| साहिर लुधियानवी
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कि अब तो लोग!
तुम्हारे अहद-ए-हुकूमत का सानेहा ये है,कि अब तो लोग घरों से भी कम निकलते हैं| मुनव्वर राना
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खिलखिला के कैसे!
तुम्ही बताओ कि मैं खिलखिला के कैसे हँसूँ,कि रोज़ ख़ाना-ए-दिल से अलम* निकलते हैं|*कष्ट मुनव्वर राना