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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th Nov 2025

    अब तो ये बातें भी!

    उनका ग़म उनका तसव्वुर उनके शिकवे अब कहाँ,अब तो ये बातें भी ऐ दिल हो गईं आई गई| साहिर लुधियानवी

  • 5th Nov 2025

    दिल की धड़कन में!

    दिल की धड़कन में तवाज़ुन* आ चला है ख़ैर हो,मेरी नज़रें बुझ गईं या तेरी रानाई गई|*विराम साहिर लुधियानवी

  • 5th Nov 2025

    सूरज की पेशी!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय कन्हैया लाल नंदन जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। नंदन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैया लाल नंदन जी का यह नवगीत – आँखों में रंगीन नज़ारेसपने बड़े-बड़ेभरी धार लगता है जैसेबालू बीच खड़े । बहके…

  • 4th Nov 2025

    कैसे कैसे पैकरों की!

    कैसे कैसे चश्म ओ आरिज़ गर्द-ए-ग़म से बुझ गए,कैसे कैसे पैकरों की शान-ए-ज़ेबाई गई| साहिर लुधियानवी

  • 4th Nov 2025

    हम करें तर्क-ए-वफ़ा!

    हम करें तर्क-ए-वफ़ा अच्छा चलो यूँ ही सही,और अगर तर्क-ए-वफ़ा से भी न रुस्वाई गई| साहिर लुधियानवी

  • 4th Nov 2025

    ऐ ग़म-ए-दुनिया !

    ऐ ग़म-ए-दुनिया तुझे क्या इल्म तेरे वास्ते,किन बहानों से तबीअ’त राह पर लाई गई| साहिर लुधियानवी

  • 4th Nov 2025

    बिक गए जब तेरे लब!

    बिक गए जब तेरे लब फिर तुझ को क्या शिकवा अगर,ज़िंदगानी बादा ओ साग़र से बहलाई गई| साहिर लुधियानवी

  • 4th Nov 2025

    कि अब तो लोग!

    तुम्हारे अहद-ए-हुकूमत का सानेहा ये है,कि अब तो लोग घरों से भी कम निकलते हैं| मुनव्वर राना

  • 4th Nov 2025

    खिलखिला के कैसे!

    तुम्ही बताओ कि मैं खिलखिला के कैसे हँसूँ,कि रोज़ ख़ाना-ए-दिल से अलम* निकलते हैं|*कष्ट मुनव्वर राना

  • 4th Nov 2025

    उसी गली से कई!

    जहाँ से हम को गुज़रने में शर्म आती है,उसी गली से कई मोहतरम निकलते हैं| मुनव्वर राना

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