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सन्नाटा शहर में!
आज फिर से मेरी एक पुरानी कविता प्रस्तुत है, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- बेहद ठंडा है शहरी मरुथललो अब हम इसको गरमाएंगे,तोड़ेंगे जमा हुआ सन्नाटाभौंकेंगे, रैंकेंगे, गाएंगे। दड़बे में कुछ सुधार होना है,हमको ही सूत्रधार होना है,ये जो हम बुनकर फैलाते हैं,अपनी सरकार का बिछौना है।चिंतन सन्नाटा गहराता है,शब्द वमन से उसको ढाएंगे।तोड़ेंगे जमा…
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देख ली दुनिया हमने!
जुस्तुजू जिस की थी उस को तो न पाया हम ने,इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हम ने| शहरयार
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दिन ढले यूँ तिरी!
सुर्ख़ फूलों से महक उठती हैं दिल की राहें,दिन ढले यूँ तिरी आवाज़ बुलाती है हमें| शहरयार
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सुंदर कांड-अंतिम भाग
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं मुकेश जी द्वारा गाए गए सुंदर कांड के अंतिम भाग का कुछ अंश अपने स्वर मे प्रस्तुत कर रहा हूँ- विनय न मानहि जलधि जड़, गए तीन दिन बीत आशा है आपको यह पसंद आएगाधन्यवाद । ******
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ये ज़मीं चाँद से!
ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें,ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें| शहरयार
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ख़ौफ़ में डूबे हुए !
ख़ौफ़ में डूबे हुए शहर की क़िस्मत है यही,मुंतज़िर रहता है हर शख़्स कि क्या होता है| मुनव्वर राना
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दिल्ली! (कविता)
आज मैं हिंदी के अत्यंत श्रेष्ठ कवि तथा राष्ट्रकवि के रूप में सम्मान पाने वाले स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की एक अलग किस्म की रचना शेयर कर रहा हूँ। दिनकर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की यह कविता –…