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घर की दहलीज़ पे!
घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें,मुझ को मत रोक मुझे लौट के घर जाना है| मुनव्वर राना
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मुझ को गहराई में!
मुझ को गहराई में मिट्टी की उतर जाना है,ज़िंदगी बाँध ले सामान-ए-सफ़र जाना है| मुनव्वर राना
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शांत कदम – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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कुर्सियाँ रह जाएँगी!
क्यों बनाते हो सियासत को तुम अपना हम-सफ़र,सब चले जाएँगे लेकिन कुर्सियाँ रह जाएँगी। आदर्श दुबे
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बोलियाँ रह जाएँगी!
सिर्फ़ लफ़्ज़ों को नहीं अंदाज़ भी अच्छा रखो,इस जगत में सिर्फ़ मीठी बोलियाँ रह जाएँगी। आदर्श दुबे
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बेड़ियाँ रह जाएँगी!
इस नए क़ानून का मंज़र यही दिखता है अबपाँव कट जाएँगे लेकिन बेड़ियाँ रह जाएँगी। आदर्श दुबे
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तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से मैं , अपने स्वर में कैफी आज़मी साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ जिसे ‘अर्थ’ फिल्म के लिए जगजीत सिंह जी ने गाया था- तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो! आशा है आपको यह पसंद आएगी, धन्यवाद। *****