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और जताया भी नहीं!
तुम तो शायर हो “क़तील” और वो इक आम सा शख़्स,उसने चाहा भी तुझे और जताया भी नहीं| क़तील शिफ़ाई
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जिसे पास बुलाया भी नहीं!
रोज़ आता है दर-ए-दिल पे वो दस्तक देने,आज तक हमने जिसे पास बुलाया भी नहीं| क़तील शिफ़ाई
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उसने सताया भी नहीं!
बेरुख़ी इससे बड़ी और भला क्या होगी,एक मुद्दत से हमें उसने सताया भी नहीं| क़तील शिफ़ाई
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जिसका कोई साया भी नहीं!
प्यास वो दिल की बुझाने कभी आया भी नहीं,कैसा बादल है जिसका कोई साया भी नहीं| क़तील शिफ़ाई
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प्यार की बोली, बोले कौन!
आज एक बार फिर से मैं, अपनी कविताओं, नज़्मों, कहानियों और उपन्यासों में बड़ी सादगी से बड़ी बातें कहने वाले ज़नाब राही मासूम रज़ा साहब की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| उनका एक प्रसिद्ध उपन्यास है ‘दिल एक सादा कागज़’ मुझे याद है उनके उपन्यास पढ़ते हुए भी ऐसा लगता था जैसे कोई कविता…
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चूड़ियाँ, मौसीकियाँ, शहनाइयाँ!
मेरे दिल की धड़कनों में ढल गई,चूड़ियाँ, मौसीकियाँ, शहनाइयाँ| कैफ़ भोपाली
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बदलियाँ, बरखा रूतें, पुरवाइयाँ!
ज़ख्म दिल के फिर हरे करने लगी,बदलियाँ, बरखा रूतें, पुरवाइयाँ| कैफ़ भोपाली
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शाहियाँ, सुल्तानियाँ, दराइयाँ!
एक रिंद-ए-मस्त की ठोकर में है,शाहियाँ, सुल्तानियाँ, दराइयाँ| कैफ़ भोपाली