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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 19th Apr 2022

    और जताया भी नहीं!

    तुम तो शायर हो “क़तील” और वो इक आम सा शख़्स,उसने चाहा भी तुझे और जताया भी नहीं| क़तील शिफ़ाई

  • 19th Apr 2022

    वो फ़साना जो कभी–

    सुन लिया कैसे ख़ुदा जाने ज़माने भर ने,वो फ़साना जो कभी हमने सुनाया भी नहीं| क़तील शिफ़ाई

  • 19th Apr 2022

    जिसे पास बुलाया भी नहीं!

    रोज़ आता है दर-ए-दिल पे वो दस्तक देने,आज तक हमने जिसे पास बुलाया भी नहीं| क़तील शिफ़ाई

  • 19th Apr 2022

    उसने सताया भी नहीं!

    बेरुख़ी इससे बड़ी और भला क्या होगी,एक मुद्दत से हमें उसने सताया भी नहीं| क़तील शिफ़ाई

  • 19th Apr 2022

    जिसका कोई साया भी नहीं!

    प्यास वो दिल की बुझाने कभी आया भी नहीं,कैसा बादल है जिसका कोई साया भी नहीं| क़तील शिफ़ाई

  • 19th Apr 2022

    प्यार की बोली, बोले कौन!

    आज एक बार फिर से मैं, अपनी कविताओं, नज़्मों, कहानियों और उपन्यासों में बड़ी सादगी से बड़ी बातें कहने वाले ज़नाब राही मासूम रज़ा साहब की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| उनका एक प्रसिद्ध उपन्यास है ‘दिल एक सादा कागज़’ मुझे याद है उनके उपन्यास पढ़ते हुए भी ऐसा लगता था जैसे कोई कविता…

  • 18th Apr 2022

    वुसअतें, खामोशियाँ, गहराइयाँ!

    ‘कैफ’ पैदा कर समंदर की तरह,वुसअतें, खामोशियाँ, गहराइयाँ| कैफ़ भोपाली

  • 18th Apr 2022

    चूड़ियाँ, मौसीकियाँ, शहनाइयाँ!

    मेरे दिल की धड़कनों में ढल गई,चूड़ियाँ, मौसीकियाँ, शहनाइयाँ| कैफ़ भोपाली

  • 18th Apr 2022

    बदलियाँ, बरखा रूतें, पुरवाइयाँ!

    ज़ख्म दिल के फिर हरे करने लगी,बदलियाँ, बरखा रूतें, पुरवाइयाँ| कैफ़ भोपाली

  • 18th Apr 2022

    शाहियाँ, सुल्तानियाँ, दराइयाँ!

    एक रिंद-ए-मस्त की ठोकर में है,शाहियाँ, सुल्तानियाँ, दराइयाँ| कैफ़ भोपाली

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