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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 19th Oct 2022

    दुख फ़साना नहीं कि तुझसे कहें!

    दुख फ़साना नहीं कि तुझसे कहें, दिल भी माना नहीं कि तुझ से कहें| अहमद फ़राज़

  • 19th Oct 2022

    तुम रहे हो द्वीप जैसे!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ गीतकार और कवि सम्मेलनों के बहुत अच्छे संचालक श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह मेरा सौभाग्य है कि सोम जी को कई बार अपने कवि सम्मेलनों में आमंत्रित करने और उनका काव्य पाठ सुनने का अवसर मुझे मिला था| लीजिए, आज…

  • 18th Oct 2022

    जब्र है मैं जिसके इख़्तियार में हूँ!

    मैं हूँ भी और नहीं भी अजीब बात है ये, ये कैसा जब्र है मैं जिसके इख़्तियार में हूँ| मुनीर नियाज़ी

  • 18th Oct 2022

    सफ़र में किसी दयार में हूँ!

    बस इतना होश है मुझको कि अजनबी हैं सब, रुका हुआ हूँ सफ़र में किसी दयार में हूँ| मुनीर नियाज़ी

  • 18th Oct 2022

    घर में हूँ या मैं किसी मज़ार में हूँ!

    मकाँ है क़ब्र जिसे लोग ख़ुद बनाते हैं, मैं अपने घर में हूँ या मैं किसी मज़ार में हूँ| मुनीर नियाज़ी

  • 18th Oct 2022

    जा भी चुका है मैं इंतिज़ार में हूँ!

    ये कैसा नश्शा है मैं किस अजब ख़ुमार में हूँ, तू आ के जा भी चुका है मैं इंतिज़ार में हूँ| मुनीर नियाज़ी

  • 18th Oct 2022

    यार सबको बना लिया न करो!

    अपने रुत्बे का कुछ लिहाज़ ‘मुनीर’, यार सबको बना लिया न करो| मुनीर नियाज़ी

  • 18th Oct 2022

    लिखकर मिटा दिया न करो!

    उनसे निकलें हिकायतें शायद, हर्फ़ लिखकर मिटा दिया न करो| मुनीर नियाज़ी

  • 18th Oct 2022

    ज़ालिमों से गिला किया न करो!

    कुछ न होगा गिला भी करने से, ज़ालिमों से गिला किया न करो| मुनीर नियाज़ी

  • 18th Oct 2022

    उनमें जाकर मगर रहा न करो!

    ख़्वाब होते हैं देखने के लिए, उनमें जाकर मगर रहा न करो| मुनीर नियाज़ी

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