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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 21st Oct 2022

    जिसे दरिया किनारे छोड़ देता है!

    बिछड़ के तुझसे कुछ जाना अगर तो इस क़दर जाना, वो मिट्टी हूँ जिसे दरिया किनारे छोड़ देता है| वसीम बरेलवी

  • 21st Oct 2022

    हादिसा वो मुझसे जोड़ देता है!

    मुझे बे-दस्त-ओ-पा कर के भी ख़ौफ़ उसका नहीं जाता, कहीं भी हादिसा गुज़रे वो मुझसे जोड़ देता है| वसीम बरेलवी

  • 21st Oct 2022

    तूफ़ान का रुख़ मोड़ देता है!

    जहाँ दरिया कहीं अपने किनारे छोड़ देता है, कोई उठता है और तूफ़ान का रुख़ मोड़ देता है| वसीम बरेलवी

  • 21st Oct 2022

    तुझे कैसे भूल जाऊँ!

    एक बार फिर मैं आज आपातकाल में अपनी विद्रोह भारी ग़ज़लों से जन-जन में लोकप्रिय हुए हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| काफी समय से मैंने उनकी कोई ग़ज़ल शेयर नहीं की है, शायद बाद में करूंगा| लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की…

  • 20th Oct 2022

    ग़म-ए-हस्ती भी गवारा कि तुम हो!

    ऐ जान-ए-‘फ़राज़’ इतनी भी तौफ़ीक़ किसे थी, हम को ग़म-ए-हस्ती भी गवारा है कि तुम हो| अहमद फ़राज़

  • 20th Oct 2022

    अभी शहर में ज़िंदा है कि तुम हो!

    आबाद हम आशुफ़्ता-सरों से नहीं मक़्तल, ये रस्म अभी शहर में ज़िंदा है कि तुम हो| अहमद फ़राज़

  • 20th Oct 2022

    तन्हा कोई हम सा है कि तुम हो!

    वो वक़्त न आए कि दिल-ए-ज़ार भी सोचे, इस शहर में तन्हा कोई हम सा है कि तुम हो| अहमद फ़राज़

  • 20th Oct 2022

    दरिया है कि तुम हो!

    इक दर्द का फैला हुआ सहरा है कि मैं हूँ, इक मौज में आया हुआ दरिया है कि तुम हो| अहमद फ़राज़

  • 20th Oct 2022

    शीरीं है कि लैला है कि तुम हो!

    हर बज़्म में मौज़ू-ए-सुख़न दिल-ज़दगाँ का, अब कौन है शीरीं है कि लैला है कि तुम हो| अहमद फ़राज़

  • 20th Oct 2022

    मुझको यही लगता है कि तुम हो!

    ये उम्र-ए-गुरेज़ाँ कहीं ठहरे तो ये जानूँ, हर साँस में मुझको यही लगता है कि तुम हो| अहमद फ़राज़

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