-
इक न इक हमदर्द!
ज़िंदा रखने की रिवायत आस्तीं के साँप की,इक न इक हमदर्द भी हर आदमी के साथ है| रईस रामपुरी
-
हम किसी के साथ हैं!
क्या कहें ये जब्र कैसा ज़िंदगी के साथ है,हम किसी के साथ हैं और दिल किसी के साथ है| रईस रामपुरी
-
दीवारों से मिलकर रोना!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में क़ैसर उल ज़ाफरी जी की एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे पंकज उधास जी ने गाया था- दीवारों से मिलकर रोना अच्छा लगता है, हम भी पागल हो जाएंगे, ऐसा लगता है। प्रस्तुत है यह वीडिओ- आशा है आपको यह पसंद आएगाधन्यवाद।
-
थी ख़ता उनकी मगर!
थी ख़ता उन की मगर जब आ गए वो सामने,झुक गईं मेरी ही आँखें रस्म-ए-उल्फ़त देखिए| जोश मलीहाबादी
-
वाह क्या अशआर हैं!
रश्हा-ए-शबनम बहार-ए-गुल फ़रोग़-ए-मेहर-ओ-माह,वाह क्या अशआर हैं दीवान-ए-फ़ितरत देखिए| जोश मलीहाबादी
-
सूरज पर अभियोग!
प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- वादीगण जब सूरज पर अभियोग लगाएंगे,साक्षी बनकर आंख मूंदकितने जन आएंगे। कितनों से दुश्मनी सदा यहलेता रहता है,बिन मांगे हर जगह रोशनी देता रहता है।यह पहले ले जान कहाँरोशनी अवांछित हैकितने सारे कृत्य इसी सेहोते बाधित हैं। मौका पाकर सब अपनेमसले सुलझाएंगेपूरे मन से…
-
एक चश्मा हुस्न का!
फूट निकलेगा जबीं से एक चश्मा हुस्न का,सुब्ह उठ कर ख़ंदा-ए-सामान-ए-क़ुदरत देखिए| जोश मलीहाबादी
-
आदमियत देखिए!
ये भी कोई बात है हर वक़्त दौलत का ख़याल, आदमी हैं आप अगर तो आदमियत देखिए| जोश मलीहाबादी
-
सिर्फ़ इतने के लिए!
सिर्फ़ इतने के लिए आँखें हमें बख़्शी गईं,देखिए दुनिया के मंज़र और ब-इबरत* देखिए|*Learn From It जोश मलीहाबादी
-
मुस्कुरा कर इस तरह!
मुस्कुरा कर इस तरह आया न कीजे सामने,किस क़दर कमज़ोर हूँ मैं मेरी सूरत देखिए| जोश मलीहाबादी