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और क्या घर लेके आया है!
तेरी महफ़िल से दिल कुछ और तनहा होके लौटा है,ये लेने क्या गया था और क्या घर लेके आया है| राजेश रेड्डी
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वो ख़ंजर लेके आया है!
तबस्सुम उसके होठों पर है उसके हाथ में गुल है,मगर मालूम है मुझको वो ख़ंजर लेके आया है| राजेश रेड्डी
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अपना मुकद्दर लेके आया है!
कोई इक तिशनगी कोई समुन्दर लेके आया है,जहाँ मे हर कोई अपना मुकद्दर लेके आया है| राजेश रेड्डी
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मुझे मिले कुछ पुराने पत्र – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया…
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फैल जाए न बाज़ार देखना!
अच्छी नहीं है शहर के रस्तों की दोस्तीआँगन में फैल जाए न बाज़ार देखना…..! निदा फ़ाज़ली
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उस किनारे सितारे भी फूल भी!
दरिया के उस किनारे सितारे भी फूल भी,दरिया चढ़ा हुआ हो तो उस पार देखना | निदा फ़ाज़ली
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हाथ में तलवार देखना!
मैदाँ की हार-जीत तो क़िस्मत की बात है, टूटी है जिसके हाथ में तलवार देखना | निदा फ़ाज़ली
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औरों को समझाया है!
कभी-कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है,जिन बातों को खुद नहीं समझे, औरों को समझाया है| निदा फ़ाज़ली